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अधुरा सपना … श्रृंगार

श्रृंगार

आज श्री ने मन बना लिया था की आज वह तैयार होगी।

और वह अपना श्रृंगार पूरा करेगी, जिसका उसने कभी सपना देखा था।

श्री ने छमछम पायल , रंग  बिरंगी चुडिया ,चटक रंग की साडी…

सब कुछ अपने मन का किया……आज 10 साल  बाद श्री ने बचपन की इच्छा पूरी कर ली। 

हर लड़की को बचपन से ही सजने सवरने का बहुत मन होता है, अपने आसपास देखती भी है।

सभी को श्रृंगार करते जैसे- माँ, भाभी, बहन को श्रृंगार करते।

तो मन में अपने लिए भी ढेर सारा सपना बुनने लगती, ऐसी ही कहानी है श्री की। 

श्री अब 14 वर्ष की हो चुकी है, यह उमर ही होता है…ढेर सारी जिज्ञासा का, साथ ही श्रृंगार  करने का |

श्री भी इसी नाव में सवार हो चुकी थी।

बार – बार दर्पण देखती तो कभी रंग बिरंगी चुडिया पहनती, तो कभी लिपिस्टिक, नेल पालिस लगाती।

और अपने आप को देखकर खुश होती।

श्री के मन में एक सवाल हमेशा आता अपनी माँ को देख कर, माँ क्यों तैयार नहीं होती है।

लेकिन वो कभी पूछ नहीं पाती।

श्री का बार-बार दर्पण देखना माँ और दादी को रास नहीं आता था, दोनों हमेशा गुस्सा करती…

और कहती- क्या है, श्री  पढाई पर ध्यान दो  . . .ये साज -शृंगार शादी के बाद करना, अभी सिर्फ पढ़ाई करो।

और यह सब सुन श्री उदास हो जाती।

आज श्री की चाची आने वाली थी, उन लोग बनारस से घूम कर आ रहे थे।

फ़ोन पर ही चाची ने बता दिया था।

वह श्री के लिए चुडिया ला रही है, और श्री बेसब्री से चाची का इंतजार कर रही थी।

चाची के आते ही श्री ने उत्सुकता से पूछा, चाची चुडिया कहा रखी है।

माँ ने डाटते हुए कहा पहले पानी तो पी लेने दो, आते ही शुरू हो गई।

चाची ने हसते हुए कहा मुझे पता था, दीदी…

यह उम्र ही होता है ऐसा, मैंने पहले से ही पर्स में रख लिया था।

और श्री को देते हुए कहा-ये रही श्री तुम्हारी चूड़ी।

श्री चुडी लेकर अपने कमरे की तरफ भाग गई और माँ पीछे से आवाज देते रह गई।


इन सब में श्री कब 21  साल की हो गई पता ही नहीं चला और ग्रैजुएशन भी पूरा कर लिया।

अब श्री के लिए रिश्ते आने लगे थे, जब भी कोई लड़का श्री को देखने आता बुआ कहती थी।

देखा श्री मै ना कहती थी अच्छा पढ़ लोगी तो…

अच्छा रिश्ता मिलेगा और देखो अब कितना अच्छा रिश्ता मिलने लगा . 



श्री की शादी भी हो गई, एक नौकरीपेशा पढ़े -लिखे लड़के से, श्री बहुत खुश थी।

अधूरे श्रृंगार के सपने जो पुरे होने वाले थे।

और दूसरे दिन वो सारा श्रृंगार छमछम पायल ,बिंदी ,सिंदूर ,चुडी ,महवर सबकुछ पहन कर पति का इंतजार करने लगी।

और आईने में अपने आप को देख -देख कर शर्म से लाल हो रही थी।

पति कमरे में घुसते ही, श्री को बिना देखे बोला,जाओ पापा के लिए चाय नाश्ता बाना दो।

श्री जाने के लिए जैसे खड़ी हुई चूडियो और पायल की आवाज हुई…

जिसे पति ने सुनते ही चिढ़ते हुये बोला, इतनी सारी  चुडिया और  ये छमछम पायल इसकी आवाज मुझे बिलकुल पसंद नही।

अभी पहले ये सब उतारो, उसके बाद जाना।

श्री के आँखों में पानी भर आया और सिसकते हुए सब कुछ निकलाने लगी।

पति ने उसकी ओर ध्यान ही नही दिया। 

किचन की ओर जा ही रही थी की, सासु माँ ने कहा।

हमारी बेटीया ऐसे काजल नहीं लगाती …तुमने आईना देखा भी है कैसा लग रहा है।

श्री रोते हुए वहा से चली गई। 

अब यह रोज का था कभी साड़ी का रंग पसंद नहीं आता, तो कभी बात करने का तरीका, तो कभी जोर से हसना।

अब श्री का मन इन सब से  धीरे -धीरे  करके उखड़ते जा रहा था।

और साथ ही अपने आप से भी, मायके में इतनी गलतिया किसी ने नहीं  निकाली थी।

आज श्री को विदाई के समय कही गई माँ की बात याद आ रही थी . . . 

श्री शादी के बाद सब कुछ बदल जाता है।


  श्री की शादी को आज 10 साल होने वाला था, श्री अब दो बच्च्चो की माँ भी बन गई थी। 

आज बच्चे सुबह से ही जीद कर रहे थे, माँ आज अच्छे से तैयार हो जाओ न।

जैसे श्री ने अलमारी खोला चाची की दी हुई चूडियो का डिब्बा नीचे गिर गया।

जो उसने कभी पहना ही नहीं था, वो छमछम वाली पायल बिलकुल नई थी।

श्री पुराने यादो में खो गई, उसे अपनी माँ की याद आ रही थी। 

माँ से जो सवाल पूछना चाहती थी, उसका भी जवाब मिल गया था।

कभी पति के लिए, कभी सास के लिए अपने आप को बदला लेकिन किसी को खुश नहीं कर पाई।

अपने आप को इन्ही सब चीजों में खो दिया था। 

श्री का पति ऑफिस से आते ही चाय पीता और आराम करता और सीधे  खाना खाने आता, कभी किसी ने श्री की खुशी नहीं सोची।

यदि श्री का तबियत ख़राब हो…

तो सास कहती जाओ अपने मायके वहां से आराम हो जाये तो  वापस आ जाना।  

लेकिन आज श्री ने सोच लिया, आज सिर्फ वह अपनी ख़ुशी देखेंगी।

और सब काम छोड़ कर अपना कमरा बंद किया और और श्रृंगार करने लगी।

वो सब कुछ जो एक सपना बनकर कर रह गया था।

दर्पण के सामने बैठी और फिर से पुरानी बाते याद आने लगी, और अपने आप से कहती है।

सच में कितना बदल गया है, माँ सब कुछ…बिखरे हुए बाल ,अस्त -व्यस्त से साड़ी।

जैसे माँ रहा करती थी, वैसा ही हाल तो आज श्री का भी था।

कभी श्री रोती भी तो पति कहता ये मगरमच्छ के आँसू  मत बहाया करो।

आज श्री ने मन बना लिया था की आज वह तैयार होगी।

और वह अपना श्रृंगार पूरा करेगी, जिसका उसने कभी सपना देखा था। 

श्री ने छमछम पायल , रंग  बिरंगी चुडिया ,चटक रंग की साडी…

सब कुछ अपने मन का किया……आज 10 साल  बाद श्री ने बचपन की इच्छा पूरी कर ली। 

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