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अमरुद

amrud(part-2)।अमरुद एक लम्बे इम्तिहान की कहानी ।

 

पहले भाग अमरुद(पार्ट-1) में अपने पढ़ा की …. कैसे आभा की खुशहाल जिंदगी में पतझड़ का आगमन हो गया और वो  एक लम्बे

इम्तिहान देने के लिए अपने आप को तैयार करने की कोशिश करती है ।। 

 

आइये शुरु करते है कहानी का दूसरा भाग अमरुद amrud(part-2)….आभा के   

इम्तिहान की  कहानी ।

 

 भाभी ने कहा गुस्से से इसी अमरुद ने तुम्हारी जिंदगी बदल दी और अब भी तुम इसे ही देख कर खुश होती हो

…..अमरुद का अगला भाग amrud(part-2)  एक लम्बे इम्तिहान की कहानी

 

अमरुद

 

आभा अपनी माँ को फ़ोन करके रोने लगी, माँ ने कहा तुम बहुत दिन रह ली बेटा… मुझे तो लगा था चार-पाच

दिन में ही फ़ोन आएगा |

 

सब कुछ भूल जाओ मै तुम्हारे पापा को कल लेने भेज देती हु ।

आभा ने कहा माँ आपको कैसे पता चला ….माँ ने कहा मै माँ हूँ तुम्हारी ।

थोड़ी देर बाद निकिता कमरे में आई, और कहने लगी भाभी क्या-क्या पैक करना है बता दो और आपको

लेने कब आ रहे है ।

 

आभा ने कहा  …. निकिता  क्या तुम्हे मेरी याद आएगी ??? लल्ला का ध्यान रखना निकिता ।

निकिता बोली क्यों नहीं आएगी 6 साल का रिश्ता था, भाभी और लल्ला की चिंता आप मत करना…  

हम है उसको बहुत प्यार मिलेगा ।

 

निकिता फिर बोली क्या क्या डालना है …

आभा बोली कुछ अच्छी साड़ीयां तुम रख लो, मै अब नाईट गाउन में हि तो रहती हूँ ।

और मेकअप तो अब करती नहीं, तो वो भी रहने दो …

और माँ को बुला लाओ उनसे कुछ कहना है ।

 

निकिता वहा से निकली और थोड़ी देर में माँ और बेटी आभा के सामने थी।

आभा ने कहा माँ मेरे गहने अलमारी में रखे है।

उसे आप रख लो, जब लल्ला की शादी होगी तो मेरी बहु को दे देना।

 

सासु माँ ने जवाब दिया वो बहुत दूर है बहु …चाहो तो कुछ अपने पास रख लो और जो नहीं चाहिए।

वो मुझे दे दो संजय की बहु को देना भी तो होगा।

 

आभा ने बस हा में सर हिला दिया।

फिर से कमरे में शांति  ने अपना कब्ज़ा जमा लिया , और आभा शाम का इंतजार करने लगी।

 

आज आभा को इंतजार बहुत लम्बा लग रहा था, साथ ही एक परायापन का अहसास भी हो रहा था।

जिस घर को अपना समझ सजाया सवारा वो कभी अपना था ही नहीं ……

 

पैरो की आहट से आभा वापस आई अपने सोच से, उसको अब किसी के आने का अहसास बहुत  अच्छा लगता था।

 

निकिता को सामने देखते ही आभा बोली लल्ला को आज मेरे पास आने दो ….

इसके बाद तो न जाने कब मिलूं निकिता।

निकिता बोली ठीक है भाभी,  माँ से पूछ कर भेज देती हु अभी आपकी पट्टी कर दूँ और बाल बना दूँ …

 

आज बहुत दिन बाद लल्ला आभा के पास था , लेकिन आभा पहले की तरह लल्ला को गोद में नहीं उठा पा रही थी।

लल्ला  को खाना खिलाये कितने दिन बीत चुके थे।

 

लल्ला बार-बार एक ही सवाल कर रहा था , आप क्यों सोये रहते है।

आप तो मुझे अब अमरुद खिलाने भी नहीं ले जाते।

 

आभा बस रो रही थी, कल जाना जो था लल्ला से दूर, और अपने घर से भी, जहा से वह जिंदगी बिताने आई थी।

 

सबसे अलग तो हो जाये आभा लेकिन लल्ला से कैसे रह पायेगी…..

और विश्वाश भी कैसे कर ले की कोई लल्ला का ख्याल अच्छे से रख सकता है।

 

लेकिन करना तो पड़ेगा भी क्योकि वो तो अपना ही  काम नहीं कर पाती ....

कब सुबह भी हो गई इसी कसमकस में पता ही नहीं चला, और सुबह से ही आभा के पिता भी आ गए, और आते ही

चलने को कहने लगे।

 

आभा को बाहर लाया गया ,सबको जैसे आभा की विदाई की जल्दी हो …. लल्ला सबसे अनजान बाहर खेल रहा था ।

उसकी नज़रे लल्ला से अलग होना नहीं चाह रही थी …और संजय आभा की तरफ देखना भी उचित नहीं समझ रहा था।

 

आभा गाड़ी की खिड़की से अपने घर के आगन को देख रही थी लल्ला नजर नहीं आ रहा था अब, और बाहर ससुरजी

और संजय खड़े थे।

 

आभा की नजर मिलते ही संजय आंखे फेर कर वहा से जाने लगा…. आभा के पिता ने धीरे से कहा अब चले बेटी।

आभा हा में सर हिलाया ….. आभा का मन तो कर रहा था जोर-जोर से रोये लेकिन अब इसका भी अर्थ नहीं था।

 

शादी के बाद कितना स्वागत हुआ था आभा का ससुराल में घर की लक्ष्मी कहा था सासु माँ ने और आज

घर की लक्ष्मी को ही बाहर निकाल दिया बेकार होते ही।

 

कब मायका भी आ गया पता नहीं चला गाड़ी से उतार कर आभा को उसके कमरे में ले जाया गया।

आभा से मिलते ही, आभा की माँ गले लग कर फुट-फुट कर रोने लगी।

 

थोड़ी देर बाद भाभी भी आ गई आभा को देख कर बोली तुमसे ऐसे मिलाना होगा सोचा ही नहीं था।

चलो पट्टी कर देती हु और तुमको तैयार भी कर देती अब तो मुझे ही करना है।

 

आभा एक बात कहू बुरा मत मनना तुम्हारे बाल बहुत गंदे हो गए है……  है तो बहुत खुबसूरत लेकिन कटवा लो।

देखभाल करने में आसानी होगी …..आभा ने बीच  में ही बोला काट दो भाभी अब इन खूबसूरती का कोई मोल नहीं रहा।

 

आभा की भाभी उसका देखभाल बहुत मन लगा कर करती थी।

रोज शाम में व्हील चेयर में बैठा कर आँगन में घूमती, यहाँ पर भी अमरुद का पेड़ था।

 

एक साल होने को आये थे आभा को मायके आये, न संजय आया न लल्ला को लाया कोई …

आभा अब किसी से बात नहीं करती बस मुस्कुराया करती थी।

कभी कुछ बोलती तो एक शब्द लल्ला ……

 

आभा की मस्तिष्क में लल्ला की छवि अब भी 4 साल की ही थी।

और संजय की वो आखरी दिन की, जिसमे वो अपनी आँखे चुरा कर चला गया।

 

20 बरस बीत गए और आभा को आज पता नहीं क्यों लल्ला की बहुत याद आ रही थी।

और शाम को जब आभा की भाभी आभा को लेकर आगन में गई तो…..

को मीठे पके अमरुद देख कर लल्ला की याद और अधिक आने लगी।

 

और जैसे ही कहा भाभी लल्ला को अमरुद बहुत पसंद है …..

भाभी तुनक कर बोली अब तुहारा लल्ला चार साल का नहीं रहा वो जवान हो चूका है।

 

और मै इतना मन से सेवा तुम्हारा इसलिए करती हूँ , क्योकि मै भी बहु हूँ…..

और तुम्हारे आने से बेटी होने का अहसास और गहरा हुआ।

 

लेकिन आभा का नजर तो अब भी अमरुद पर था और ध्यान अपने लल्ला पर , भाभी क्या बोल रही उसे

ध्यान ही नहीं था।

 

भाभी उसे हमेशा की तरह कुछ देर के लिए छोड कर चली गई …

और जब आई तो आभा की नजर अमरुद पर ही थी।

भाभी ने कहा गुस्से से इसी अमरुद ने तुम्हारी जिंदगी बदल दी और अब भी तुम इसे ही देख कर खुश होती हो …..

 

जैसे ही चेयर को घुमाया आभा सामने की तरफ झुक गई, आभा की भाभी का चीख निकल गया।

सब वहा पर पहुच चुकें थे, और आभा अब आजाद हो चुकी थी…..अपने दर्द से।

 

 

 

 

 

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