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अंतिम पश्चाताप

अंतिम पश्चाताप

 

लेकिन यहाँ आने के बाद उन लोगो से कभी मिलने गया ही नहीं, मेरी भाभी मुझे कभी पसंद

ही नहीं करती थी।

काफी दुःख मिला था मुझे, इसलिए मीरा जैसी पत्नी मिली जिसने मुझे भरपूर प्यार दिया। 

 

 

इंसान अपने जीवन मे बहुत से गलतिया या अच्छे काम करता है और इंसान ही कर्मो के अनुसार सुख और दुख का अनुभव करता है

यही एक चीज है जो पशुओ और इन्सानो मे भेद करती है।

इंसान अपनी अतिम समय मे जो बोलता है वह उसी के जुबानी मे पूरे जीवन का लेखा – जोखा होता है।

जो की उसके पूरे जीवन सफर का एक निर्मल और निःस्वार्थ अंतिम पश्चाताप होता है।

                                                                                                                                         

इंसान अंतिम समय में जो पछतावा करता है, या अपनी उस गलती को स्वीकार करता है।

जिसे कभी वह स्वीकार नहीं कर पता, जब मनुष्य अपने झूठे अहम को त्याग देता है।

वही असली पश्चाताप होता है।

 

उसके पश्चाताप से  जो अश्रु धारा बहती है, वह पवित्र होता है।

कुछ ऐसी ही कहानी है उपाध्याय जी की। 


खूबचंद उपाध्याय एक हट्टे -कट्टे व साफ चरित्र के आदमी थे, सफ़ेद वस्त्र के अलावा उन्होंने

किसी रंग का वस्त्र नहीं पहना।

 

साथ ही गांव के सरपंच भी थे, सुबह 4 बजे उठाना नित्यकर्म करके पूजा करना उसके बाद अपने खेतो में काम करना।

फिर पंचायत जाना यही उनका रोज का कार्य था।

 

उपाध्याय जी के चार पुत्र थे, और पत्नी का नाम मीरा था, उनकी पत्नी का स्वभाव बहुत ही नरम था।

गांव में सब उसकी तारीफ करते थे।

उपाध्याय जी कभी अपनी पत्नी को नाम से नहीं बुलाते थे।

 

हमेशा प्रेमिका ही बोलते दोनों में अटुट प्रेम भी था।

उपाध्याय जी अब बूढ़े हो चले थे, लेकिन उनका स्वाभिमान कम नहीं हुआ था, न ही उनका दिनचर्या बदला था।

 

सारे पुत्रो की शादी भी हो गई थी, नाती-पोतो की किलकारी भी आँगन में गूंज चुकी थी। 

 उपाध्याय जी को कभी लड़की या लड़को का भेद नहीं था।

वह अपनी नाती और पोतियो को बराबर प्यार देते और कहानियाँ सुनाते, जीवन मे आगे बदने के लिए सभी को बराबर रूप से प्रेरित करते।

 

बच्चे भी अपने दादा-दादी से बहुत प्यार करते।

हर शाम उपध्याय जी रामायण  का पाठ करते और दोहो को  जोर -जोर से गाते, जब रामायण पढ़ते तो सारे बच्चे ध्यान से सुनते।

रोज शाम 8 बजे खाना खाते  और 9बजे  सोने चले जाते। 

उपाध्याय  जी के घर खुशिया बहुत  थी, क्योकि भाइयो में भी प्यार था।

लेकिन जीवन हमेशा एक सा हो तो वह जीवन कहा, समय बदलता है हर किसी का, ये तो नियति है।

 

समय बदलते वक्त कहा लगता है, उपध्याय जी और बूढ़े  हो गए और उनके बेटो के बीच दरार भी आ गया।

सब अलग हो गए और उपाध्याय जी अकेले हो गए अपनी पत्नी के साथ, इस बात ने दोनों को अंदर से तोड़ दिया।

 

नाती -पोतो से भी दूर हो गए।

वैसे भी बुढ़ापे मे हर व्यक्ति अपना प्रतिबिंब नाती – पोतो मे ही देखता है ।


करीबन साल भर होते -होते उपाध्यय जी का पत्नी का भी स्वर्ग वाश हो गया।

पत्नी के जाते ही उपाध्याय जी बिस्तर पकड़ लिए।

अब बेटे भी आ गए थे, अपने पिताजी का देखभाल करने लेकिन उपाध्याय जी को अपनी ही सुध नहीं थी तो किसी और की क्या लेते।

 

कभी पंखे से  बात करते तो कभी खिड़की से, कभी नाती-पोतो को पास बैठा कर  बोलते मैंने कभी प्रेमिका का ख्याल नहीं रखा  . . .

पर बच्चो को ये सब बाते कहा समझ आती।

या यू कहे की इंसान अपने समय पर ही हर चीज को समझता है |

 

जब भी बच्चे दादा के कमरे में जाते उनका ध्यान दादी के संदूक में  होता,और हमेशा पूछते उसमे क्या है?

पर दादा तो अपने ही दुनिया रहते उन्हें कहा कोई बात सुनाई देती। 


और निरंतर बोलते रहते, मैंने  कभी अपनी प्रेमिका की बातो को महत्व नहीं दिया ,उसे कितना शौक  था।

गहनों का जब भी विपत्ति आई मैं उसके गहने एक-एक करके बेचते गया, और हर बार कहता नई  फसल आएगी तो नया गहना बनवा लेगें।

 

लेकिन कभी नया खरीद ही नहीं पाया उसके लिए।

परिवार भी तो मेरा बहुत बड़ा था, हर किसी की जरूरत भी पूरा करना पड़ता था।

मेरी बुआ भी रहती थी, अपनी दो बेटियों के साथ, उनका भी मै  ही  ख्याल रखता था।

हँसता  -खेलता भरा -पुरा  परिवार था मेरा। 

 

एक बात और  बताऊ…. यह मेरा ससुराल है।

मेरा घर पास के गांव में ही है। वहा पर मुझे मेरे पुरखो की जमीन मिली थी। वहाँ  पर आम ,बीही (अमरुद ), इमली  के पेड़ थे।

 

जहा हम सब भाई खेला करते और खुब आम खाया करते थे।

बड़ा प्यार था हम लोगो में पिता तो बचपन में ही चल बसे थे, माँ ने ही सम्हाला था।

हम पाचो  भाई -बहन को . . . . विवाह होते ही सभी अलग -अपना गृहस्थी बसा लिए।

भाइयो में दरार पड़ गई ,मा मेरे साथ रहती थी।

माँ के जाते ही मै अकेला हो गया, भाइयो ने मेरा शादी कराया। 


तुम्हारी दादी का भी कोई भाई नहीं था।

वो सबसे बड़ी थी, दो बिन बिहाई बहन थी।

जैसे ही मेरे सास -ससुर का स्वर्गवास हुआ सारी  जिम्मेदारी मैंने ले ली।

यहाँ (ससुराल ) आया और यही का रह गया, और मुझे  जो पूर्वजो की जमीन और घर मिली थी।

तुहारी दादी के लाख मना करने पर भी बेच दिया।

 

यह कह कर की यहाँ का  जो  घर  मिट्टी का है।

उसे पक्की ( सीमेंट) का बनवाऊंगा . . ..और बनवाया भी। 

लेकिन आज मुझे उस घर का आँगन वहां के मीठे आम का  पेड़ बहुत याद आता  है।

बीही भी बहुत याद आता है, पिता का साया तो बचपन में ही चला गया था।

मै बहुत  छोटा था, जब पिताजी की मृत्यु हुई थी, भाभी- भैया ने ही पढ़ाया- लिखाया था

मुझे,,,   

 

लेकिन यहाँ आने के बाद उन लोगो से कभी मिलने गया ही नहीं, मेरी भाभी मुझे कभी पसंद ही नहीं करती थी।

काफी दुःख मिला था मुझे, इसलिए मीरा जैसी पत्नी मिली, जिसने मुझे भरपूर प्यार दिया।

मैंने अपने अहम के चलते पत्नी के बातो  को नजर अंदाज किया, आज दो महीने हो गए मीरा को गये हुए।

मै भी जल्दी जाना चाहता हु, उसके बिना एक- एक पल बहुत लम्बा हो गया है। 

 

सच में, मै  आज बहुत अकेला हो गया हु, वो कहती थी।

मै सौभाग्य के साथ ही इस दुनिया से जाउंगी और वह चली गयी।

और मै  अपने पापो को भोग रहा हूँ… 

कहते हुए आँखों में आंसू आ गए और उपाध्याय जी ने अपनी आंखे बंद कर ली।

वह चिर निद्रा मे चले गये।

 

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