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कोरोना ….की एक मासूम स्टोरी

कोरोना ….की एक मासूम स्टोरी

 

 

पहला अनुभव जो बहुत डरवाना था, बचपन में हालीवुड मूवी देखी थी ,  की कैसे एक वायरस जीवन में हाहाकार मचाता है, एक वायरस ने

जीवन को किस तरह बदला, …..उसी अनुभव की एक मासूम सी कहानी ।। 

 

लेकिन इसके साथ  यह भी कहूँगा जब महामारी(कोरोना)  व्यापक रूप में नहीं थी तो डर व्यापक था और

जब डर ख़त्म तो महामारी व्यापक है।

चलो शुरू करते है यह कहानी जो शायद सारे पिता की हो ….कोरोना ….की एक मासूम स्टोरी

 

 

मेरा बेटा है आयु ..2 साल का ..छोटा सा नटखट ,शैतान लेकिन समझदार …या यु कहूँ की उम्र से कुछ ज्यादा ही समझदार। 

उसकी समझदारी से भरी एक वाकया , एक अनुभव ,जिसको मै आपके साथ शेयर करने से रोक नहीं पाया।

 

कोरोना से पहले का समय था, मै रोज अपने ऑफिस या किसी भी काम से बाहर जाता था , घर में मेरी पत्नी और मेरा बेटा जो

उस समय लगभग 1 साल का था।

घुटनों के बल चलता, कही भी तीव्र गति से पहुच जाता, किसी भी चीज को जानने और समझने की उत्सुकता बहुत होती थी उसे ,

 

तो फिर से हम, उस कहानी में लौटते है , मै जब भी कही बाहर जाता तो वो मेरे साथ जाने के लिए बहुत रोया करता, और जैसे ही मै घर

वापस आता, मेरी बाइक की आवाज सुनकर घुटनों के बल दौड़ के गेट के पास आता, दरवाजा तो खोल नहीं पाता लेकिन मुझसे

मिलने की  ख़ुशी बहुत दिखाई पड़ती थी उसके चेहरे पर,  या कह सकते है मै भी उतना ही उत्सुक रहता था , मुझे किसी और का दरवाजे

के सामने दिखना या खोलना पसंद नहीं था।

 

मेरी पत्नी दरवाजा खोल के किनारे हो जाया करती थी ताकि हम दोनों एक दुसरे को देख सके , नजरो से प्यार होने

के बाद मै तुरंत उसे गोद में उठा लिया करता था और एक दुसरे को प्यार-दुलार करते । वो पल मेरे लिए सबसे खुबसूरत और

एक अनोखा अहसास हुआ करता था। ऐसा लगता ये पल यही रुक जाये .

 

फिर जैसे मूवी में एक विलेन का एंट्री होती  है वैसे ही हम दोनों के पिता –पुत्र प्यार में विलेन का एंट्री हुई  |

नाम था कोरोना महाशय ,अब कही भी जाओ तो घर आने के बाद हाथ धोना, कपडा बदलना, ये सारी  चीजे जीवन का एक अभिन्न

अंग बनचूकी थी  |

इस सब के बाद ही घर में घुसना होता था….

 

अब मै कही से भी आता, घर को …पत्नी दरवाजा खोलती, बेटा दूर बैठ के देखता ,जिद करता दरवाजे के पास आने के लिए , गोद में आने के

लिए उत्सुक होता …लेकिन क्या करे पिता होने के नाते बच्चे की सुरक्षा ज्यादा जरुरी है , नजरो से प्यार होता लेकिन, मिलन नहीं हो पाता,

 

मै बाहर से ही हाथ पैर धोकर वाशरूम जाकर कपडे बदल कर आता, तब तक बेटा घुटनों के बल पीछे –पीछे घूमता, और

उदास हो जाया करता था।

 

बाहर  से खाने-पीने की कोई भी चीजे अब उसके लिए नहीं ला सकता था, कोरोना का डर जो था ।

 

अब बेटा 2 साल का है …समझदार हो चूका है ,उसकी ये समझदारी मुझे पसंद नहीं लेकिन जरुरी है|

 

अब वो चलते हुए आता है , दरवाजा खोलता है और खुद ही दूर चल देता है, थोडा डांस करता है , नजरो से दुलार करता है | वो ये नहीं

समझता की कोरोना नाम की कोई महामारी होती भी है की नहीं। अभी कोरोना शब्द ही उसके शब्दकोष में नहीं है ,लेकिन वो ये जरुर

समझता है की पापा उसे गोद में नहीं उठाएंगे, ना ही मम्मी, पापा के पास जाने देंगी। 

 

कोरोना ने हर किसी की जिंदगी को बदला, किसी के अपने छूटे , कोई अपनों से छूटा , रोजगार, शहर सब छूटने लगे लेकिन मैने तो अपने

बच्चे का मासूमियत खो दिया, वो अहसास प्यार कहाँ से वापस लाऊ….. उम्र कहा रूकती है जनाब……

 

 

                                                                                                         Adv. Rajesh Verma 

                                                                                                   High Court of Chhattisgrah

                                                                                                       8819967808, 9691425141 

                                                                                                                                      

                                                                                                                                                       

2 thoughts on “कोरोना ….की एक मासूम स्टोरी

  1. बहुत अच्छी स्टोरी है सर आपकी अनोखा स्टोरी है लेकिन क्या करें सर वक्त के साथ परिवर्तन भी जरूरी है। इस बच्चे के प्यार ने तो आपका पूरा संसार खुशियों से भर देता था लेकिन क्या करें सर जी इस बीमारी इस वायरस ने पता नहीं क्या क्या छीन लिया

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