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डर ( पार्ट – 1 )

डर

 

कभी-कभी जीवन में कुछ ऐसी घटनाये घटित होती, जिस पर  यकीन कर पाना मुश्किल हो जाता है।

ऐसी ही कहानी है विजय की, जो उस डर से बाहर निकलने में कामयाब हुआ

साथ ही अपने डर को जीतने में भी ….

 

 

 

विजय बहुत ही शरराती लड़का था, और साथ ही नई -नई चीजों  को जानने में दिलचस्पी रखता था।

और घूमना तो विजय को बहुत पसंद था जब भी मौका मिलता दोस्तों के साथ गुमने निकल जाता था।

जब विजय  12 वर्ष का हुआ तो उसने एक प्लान बनाया की आज रात में घूमने चलेंगे।

सबने एक-दूसरे से प्रॉमिस किया की, यह बात कोई किसी के घर में नहीं बताएगा।  

सभी दोस्त तय जगह पर मिले और घूमने चले गए यह पहला अनुभव था।

सुनशान और अँधेरी रात में घूमने का जो सभी को बहुत पसंद आया… 

करीबन एक घंटा घूमने के बाद सभी चुपचाप  घर आकर सो गए। 

 

अब इस तरह घूमना लगभग रोज होने लगा।

कुछ दिनों  तक तो किसी को पता नहीं चल पाया लेकिन विजय  का चोरी -छुपे घूमना।

माँ को पता चल गया और गुस्से में विनय को डाटते हुए बोली,रात में भूत घुमा करते है… इन्शान नहीं।

यह बात विजय के दिल को छू गई, भूत शब्द से पहली बार वाकिफ हुआ था।

जब यह बात विजय ने, अपने दोस्तों को बताई…तो सबने भी तरह-तरह की कहनी बताई।

एक दोस्त ने कहा, यहाँ पीपल के पेड़ के नीचे भूत रहता है…मेरी दीदी ने मुझे बताया है।

तो दूसरे न कहा रात में शमशान से होकर कभी गुजरना नहीं चाहिए ऐसा मेरी माँ कहती है।

सबने तय किया की रात में अब घूमने नहीं जायेगे।

 

विजय का घर गांव में था, जो की काफी बड़ा था।

चारो ओर कमरे और बीच  में आंगन था।

घर की बाहर की ओर बाड़ी भी था, जिसका गेट शाम होते ही माँ बंद कर  दिया करती थी। 

विजय बरामदे में ही सो जाया करता था, इस रात भी विजय ने ऐसा ही किया।

रात में खाना खा कर बरामदे में सो गया।

रात करीबन 12pm उसे लगा कोई उसका चादर खींच रहा है।

वो उठने की कोशिश कर ही रहा था, की उसे कोई दिखाई दिया।

विजय बहुत डर गया, और इतना जोर से चिल्लया  की सब नींद से उठ गए।

विजय  भागते हुए अपने माँ के पास गया, माँ ने पहले विजय को शांत करने का प्रयास  किया।

 

फिर विजय के पिता ने पूछा क्या हुआ था?

इस पर विजय डरते हुए बोला – कोई था वहां पर….

पिताजी जो सफेद कपड़ो में था,मुझे छूने की कोशिश कर  रहा था। 

यह सब सुन कर विजय के पिताजी बोले, बेटा यह सब तुम्हारा वहम है।

ऐसा कुछ नहीं होता, तुम एक काम करो मेरे साथ सो जाओ।

विज़य ने हाँ  तो कह दिया पर अब नींद कहा आने वाली थी। 

जैसे ही विजय ने सोने की कोशिश में आंखे बंद की, उसको दुबारा एक भयानक चेहरा दिखाई दिया।

 

विजय की चीख ही निकल गई।

पिता जी ने विजय को दुबारा समझाने का प्रयास  किया।

जो की पूरा व्यर्थ ही गया…रात भर, विजय किसी का होने का जिक्र  करता रहा और सो भी नहीं पाया। 

यह सब होने के बाद विजय की माँ डर गई थी।

उसे भी लगने लगा था, विजय पर भूत का साया है।

जब यह सब बात विजय के पिता जी को बताई, तो उन्होंने कहा ऐसा कुछ नहीं है।

विजय किसी चीज  से डर गया है, और वह उससे निकल नहीं पा रहा।

 

मै आज ही उसे किसी डॉक्टर को दिखा लता हूँ । 

डॉक्टर ने विजय की जांच की और किसी भी तरह की समस्या होने से इंकार किया।

विजय से कहा, तुम ज्यादा किसी चीज को मत सोचो थोड़े दिन आराम करो। 

घर आने के बाद विजय सब कुछ भूल के खेल रहा था की अचानक उसका ध्यान दर्पण पर गया।

 

जोर-जोर से चिल्लाने  लगा।

जैसे ही यह सब सुन कर माँ करीब आई विजय कहने लगा दर्पण के अंदर कोई है……. 

माँ डर गई और थोड़ा हिम्मत करके बोली कोई नहीं है बेटा,सिर्फ तुम्हारा वहम है।

विजय फिर सोचने लग जाता है की ये मेरे साथ क्यों हो रहा है।

लेकिन बच्चे किसी भी चीज  को जल्दी भूल जाते है विजय भी भूल गया। 

और रात में फिर बारमदे में जा कर  सो गया, माँ ने अपने पास बुलाया।

लेकिन विजय बोला, नहीं माँ मै अकेले ही सोऊंगा,रात में विजय सो ही रहा था…की फिर उसे अहसास हुआ।

 

कोई है – कोई औरत है…सफ़ेद साड़ी में॥

जो उसके पास आ रही और उसके कान में कुछ बोल रही है।

फिर से चीखने की आवाज सुन कर सब उठ गए।

विजय के पास पहुंचे, विजय ने डरते हुए बताया कोई था, जो उसके कान कुछ बोल रहा था।  

विजय की माँ तो पहले से मान रही थी, बेटे पर भूत का साया है।

 

जो अब यकीन पर बदल गया था।

लेकिन विजय के पिताअब भी यही कह रहे थे, की बेटे को किसी चीज से डर हो गई है।

जो उसके दिमाग में बैठ गई है। 

जैसे-तैसे रात गुजर गई, और अब विजय को अकेले सोने नहीं दिया जाता था।

उसके साथ कोई न-कोई जरूर होता ही था।

 

कुछ रात अच्छे से बीत गई।

विजय ने भी चैन की नीद ली, और सब निश्चिन्त हो गए की विजय अब ठीक है। 

एक दिन दोपहर में विजय खाना खा कर खेल रहा था, की कुछ अजीब हरकत करने लगा। 

एक अजीब सा और भारी  आवाज में चिल्लाने लगा।

जिसे सुनकर माँ बाहर आई, और इस दृश्य देख कर डर गई,सबको इकट्ठा किया आस-पड़ोस के भी लोग आये। 

सबने मिलकर विजय के हाथ-पैर पकडे, लेकिन कोई उसे पकड़ नहीं पा  रहा था।

वहां पर बावजूद बूढ़े -बुजुर्ग ने कहा – इसमें भूत का साया है।

 

इतना ताकत इतने से बच्चे में नहीं होती है।

इसे गांव के ही झाड़-फुक वाले बाबा को दिखा दो शायद वो कुछ कर  पाए। 

विजय के माता-पिता जल्द से जल्द अपने बच्चे को सही सलामत देखना चाहते थे।

अब दोनों को यकींन भी होने लगा था…की कुछ शक्ति है।

जो विजय को परेशान कर रही है, और विजय के पिता उसे उस बाबा के पास  ले आये।

बाबा ने आते ही विजय को देख कर कहा, इस पर कोई बुरा साया है।

 

जिसे मै ठीक नहीं कर पाऊंगा। 

आप लोग इसे कही और ले जाओ। 

विजय के पिता बोले ठीक है, लेकिन आप ही बता दो कहा ले के जाये।

क्योकि हमें पता ही नहीं इस बारे में, बाबा बोले एक देवी मंदिर है।

वहां पर जाना वो घर आकर पूजा कर देगी, लेकिन वहां बकरा लगता है।

जो भी सामान होगा वो बता देगी।

और साथ ही कहा…

 

आप लोग विजय को परसो ले के जाना वो साध्वी परसो  यानि शुक्रवार को ही मिलती है।

विजय थोड़ी देर बाद ठीक हुआ तो, अपने चारो ओर बहुत से लोगो को देख कर पूछा क्या हुआ?

सब क्यों आये है, विजय की माँ ने विजय को बताया क्या हुआ था।

कैसे वो सबको धक्का दे रहा था, तो यह सब सुनकर विजय को यकीन नहीं हुआ।

अपनी माँ को ये भी बताया, की उसके शरीर में बहुत दर्द हो रहा है। 

 

रात में जल्दी खाना कर सोने चला गया।

दस मिनट बाद अपनी माँ से बोला, ये जो चादर अपने मुझे उड़ने दिया है यह मेरा नही है।

माँ ने एक दूसरा चादर ला कर दिया, उसे भी विजय लेने से इंकार कर दिया।

माँ ने लगभग घर का सारा चादर ला दिया, लेकिन विजय ने सबको लेने से इंकार कर दिया।

तो पूछा अच्छा बताओ तुम्हारा चादर कैसा है… तो विजय ने जवाब दिया।

मेरा चादर का रंग सफ़ेद है, ऐसा सुनते ही माँ डर गई और रोने लगी।  

 

दूसरे दिन स्कूल गया।

ये जो भी हो रहा था, विजय के साथ उसका विजय के पढाई पर कोई असर नई हो रहा था।

विजय का अपने क्लास में प्रथम स्थान ही रहता।

विजय कभी-कभी किस चीज को देख कर कही खो जाता जो उसके दोस्तों को बहुत अजीब लगता।

 

कभी-कभी कुछ बोलता जो भारी आवाज में होता था, जो काफी डरवाना होता था।

कभी-कभी बच्चे विजय से, इस बारे में पुछते  लेकिन विजय को कुछ याद ही नहीं रहता था। 

दूसरे दिन सभी देवी मंदिर जाने के लिए तैयार हुए, और वह पहुंचकर सब कुछ बताया गया।

कुछ उपाय करना होगा, साथ ही यहाँ पर भी पूजा और आप लोग के घर पर भी पूजा करना पड़ेगा।

घर में पूजा के लये चार नारियल और एक बकरा का चढ़ावा लगेगा। 

मंदिर में पूजा होने के बाद, दो दिन बाद घर में पूजा करने के लिए समय दिया गया।

 

उसके लिए साध्वी खुद घर आने वाली थी।

यह सब विजय को अजीब तो लग रहा था, साथ ही अपने साथ होने वाली घटनाये भी समझ से परे हो गई थी।

मंदिर से आने के बाद भी वही सब विजय के साथ घटित हो ही रही थी। 

कभी-कभी अचानक रोने लगता, या हसने लगता…

 

कभी किसी का होने का अहसास अब दिन में भी होने लगा, कभी कोई और साथ में होता।

विजय को कुछ और दिखाई देने लगता, और सामने जो होता उसकी बाते  भी उसे सुनाई नहीं देती थी। 

तय तारीख को साध्वी पूजा करने विजय के घर पहुंची और पूजा शुरू भी हो गया।

लेकिन जब बकरे का चढ़ावा का टाइम आया तो विजय और डर  गया। 

यह पहली बार था, और चढ़ावा  होने के बाद जब बकरे के सर को नारियल के साथ बीच आँगन में दफनाया गया।

वह और डरवाना लगने लगा था, साथ ही घर के हर दरवाजे पर एक-एक नारियल दबाया गया।

 

जो  विजय के दिमाग में बस गया था। 

यह सब होने के बावजूत विजय के साथ होने वाली घटनाये हो ही रही थी।

अब विजय को अंधेरे में बहुत डर लगता था, अकेले तो सो ही नहीं पाता  था।  

विजय का बारहवीं का एग्जाम भी हो गया, और आगे की पढ़ाई  के लिए उसे अब बाहर  जाना था।

जो विजय के माता-पाता के लिए चिंता का विषय भी था।

साथ ही बेटे के भविष्य की चिंता भी थी तो भेजना भी जरूरी था।

लेकिन बेटा  अकेले रहेगा कैसे , यह बड़ा सवाल था। 

विजय इन सब बातो को अब समझने लायक हो गया था ।

अपने माता-पिता की चिंता से वाकिफ था, और साथ ही अपने डर से भी,लेकिन फिर भी जाना तो था ही। 

 

विजय  ने आगे B. E करना तय किया।

कॉलेज में एड्मिशन होने के बाद विजय के पिता ने विजय की रहने व्यवस्था एक पीजी में कर दिया।

जहाँ  उसके साथ दो और रूममेट रहने वाले थे। 

                                                                                                  to  be continuted …. 

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