Stories

दिशा

दिशा

 

अखिलेश को पता चला वो कितना गलत दिशा में था, जिसे हमेशा अपना समझता था

 

दिशा साथ देगी सोचता था, वो छोड़ के चली गई।

और जिसे हमेशा अपना होते हुए भी, पराया समझता रहा वो हमेशा से ही अपना था। 

 

                                                                            disha

 

अखिलेश बचपन से ही घर से बाहर रहा ,स्कूल की पढाई मामा के घर रह कर

पूरी की।

और कॉलेज हॉस्टल में, अपने घर केवल छुट्टियों में ही जाना होता था।

माँ का प्यार बचपन से लेकर अब तक अखिलेश को एक सा ही लगता था। 

 

उसमे उसे कभी अंतर नजर नहीं आया, उसे याद है वो पल जब बचपन में मामा 

के घर रहा करता था।

अखिलेश की  माँ, मामा  के घर आया करती थी 2-4 दिनों के लिए।

उस वक्त अखिलेश अपने आप को किसी राजा से कम नहीं समझता था।

 

माँ के आते की सारी फरमाइशे  जो पूरी हो जाती थी। 

अखिलेश के पिता जी थोड़े कठोर स्वाभाव के थे ,कभी प्यार से बात ही नहीं करते

थे।

 

अपने पिता जी से अखिलेश इतना डरते थे की, उसे मामा  का घर कभी पसन्द नहीं

आया…

पर अपने मामा के घर रहने के लिए कभी मना ही नहीं कर पाया।

 

जब आखिलेश 3-4 साल का रहा होगा उस वक्त का  धुंधला सा याद उसके दिमाग

में अब भी है।

माँ जब अखिलेश को खाना  खिलाती थी तो पास में बैठ कर  पिता जी भी

खाना  खाया करते थे।

 

कभी-कभी अखिलेश मुँह से निवाला बाहर निकाल देता था।

तो पिता जी गुस्सा करते हुए गिरे हुए निवाला को वापस खिला देते थे ।

और अखिलेश उस वक्त डर  के तुरंत खा लिया करता था। 

दिवाली का त्यौहार  बहुत अच्छा लगता था अखिलेश को और साथ ही घर भी जाने

मिलता था सो अलग।

 

दिवाली में ढेर सारे पटाखे भी मिलते थे।

जब अखिलेश दस साल का रहा होगा।

तो उसने दिवाली के दिन सारे पटाखो  से बारूद निकाल  कर एक पेपर में लपेट

लि…फिर उसे जला दिया।

 

आग तेज कब हुई अखिलेश को पता ही नहीं चला और उसके हाथ-पैर बुरी तरह से

जल गया। 

अखिलेश की आवाज से सभी लोग वहाँ पर  इकट्ठा हो गए थे।

 

तभी पिता जी आये और पहले उसे  दो थप्पड़ लगाए उसके बाद अखिलेश को उठा

कर  हॉस्पिटल ले गए।

उस टाइम का थप्पड़ भी अखिलेश को याद है बहुत जोर का जो लगा था। 

अखिलेश के पिता जी ज्यादा पढ़े-लिखे तो नहीं थे।

 

पर अपने ऊशुलो  के पक्के थे। खेती-किसानी का काम किया करते थे,उसी से पुरे

परिवार का देख-भाल करते थे।

 

हमेशा अखिलेश अपने बुआ के मुँह से सुना करता था, की अखिलेश के दादा जी

जब अखिलेश के पिताजी छोटे थे।

तभी चल बसे तब से पूरा परिवार का बोझ पिता जी पर आ गया था।

 

शायद  इसलिए इतना कठोर हो गए थे अखिलेश के पिता जी। 

जब अखिलेश हॉस्टल में पढ़ने गया तो उसे जितनी पॉकेट मॉनी मिलती उसी में काम

चला लेता।

कभी ज्यादा या कम होने की बात अपने पिता से नहीं कर पाता था।

 

कॉलेज में जब अखिलेश की मुलाकात रोशनी से हुई। 

तो पहली नजर में ही उससे प्यार कर बैठा और रोशनी को भी कुछ दिनों बाद प्यार

हो गया।

 

और अब अखिलेश की पूरी दुनिया रोशनी बन गई थी।

हर चीज  सबसे पहले रोशनी को बताता था, रोशनी भी पूरी तरह से अखिलेश का

मदद भी करती थी। 

हर शाम जब दोनों पार्क पर बैठे होते थे, रोशनी के पिताजी का  फ़ोन जरूर आता 

था।

 

उस वक्त अखिलेश को भी लगता काश, मेरे पिताजी भी मुझे कॉल करे।

माँ से तो बात होती रहती थी पर पिता जी से नहीं होती थी। 

 

देखते -देखते कॉलेज की पढाई भी पूरी हो गई।

और अब अखिलेश आगे की पढाई काम करते-करते करना चाहता था।

पिता जी से और पैसे नहीं लेना चाहता था।

रोशनी का साथ तो था ही ,जब भी रोशनी साथ होती अखिलेश को लगता था…

 

चाहे पूरी दुनिया साथ छोड़ दे लेकिन रोशनी  हमेशा साथ  देगी। 

सब दोस्तों के साथ अखिलेश दूसरे शहर आ गया और इस बीच  रोशनी से भी

झगड़ा हो गया।

 

लेकिन अखिलेश को यकीन था, रोशनी मान जायेगी ।

आने के बाद  एक नई परेशानी आ गई थी इस शहर का किराया काफी महँगा

था,जो अखिलेश को पॉकेट मनीमिलती थी।

 

उससे या रूम का किराया दे पाता।

या अपना खर्च उठा पाता और नौकरी इतनी जल्दी तो मिलती नहीं।

इस बीच बहुत बार रोशनी को कॉल किया, पर रोशनी मानने का नाम ही नहीं ले

रही थी। 

 

दोस्तों ने कहा अब इससे सस्ता रूम नहीं मिल पायेगा, तो शाम को अखिलेश ने

अपने पिताजी को फ़ोन किया।

शुरू में पिताजी कोभी कुछ अजीब लगा की अखिलेश कैसे मुझे फ़ोन कर रहा है।

 

पिता जी ने फ़ोन उठाया फोन में अखिलेश  कुछ बोल नहीं पा रहा था।

पिताजी समझ गए थे की कुछ गलत हुआ है क्युकी अखिलेश की लम्बी लम्बी साँस

लेने की आवाज आ रही थी।

 

और वह काफी उदास  लग रहा था। 

अखिलेश  रोते हुए बोला पिता जी यहाँ पर किराया बहुत महँगा है।

पिताजी ने कहा कितना है, अखिलेश ने फिर नर्वस होकर बोला 4 हजार…….

पिता जी ने कहा अगर 8 हजार भी होगा तो तु रूम लेले और रो क्यों रहा है।

 

मैं हूँ  न ,मेरे होते हुए तुम्हे किस बात की चिंता हो रही है, जितना भी होगा मैं  भेज

दूंगा। 

 

अखिलेश को पता चला वो कितना गलत दिशा में था।

जिसे हमेशा अपना  समझाता था साथ देगी सोचता था, वो छोड़ के चली गई।

और जिसे हमेशा अपना होते हुए भी पराया समझाता राहा वो हमेशा से ही

अपना था। 

 

3 thoughts on “दिशा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate Page »