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दीवार

 

 

 

दीवार

 

कमरे से बुढ़िया की हँसने की आवाज आ रही थी, एक टेबल पर पंखा रखा था, जो चलता तो कम था पर आवाज तूफानों वाली करता था|

बाहर धुप बहुत तेज थी और गर्म हवाये, लू भी चल रही थी, गर्मी मानो

अपने चरम पर हो।

जिसके करण दरवाजो पर लगे परदे आगे-पीछे हो रहे थे |

 

 

कमरे के अन्दर दो खाट लगी थी एक में बूढी औरत लेटी थी और बगल के खाट में बुढा आदमी सोया था।

दोनों पति-पत्नी अपने जीवन के अंतिम पल का इंतजार कर रहे थे …

लेकिन जीने की इच्छा, किसी भी उम्र में ख़त्म कहाँ होती है |

 

बूढी औरत कभी पंखा से बात करती, तो कभी लाइट से तो कभी दीवार से।।।

कमरे का आकार अब बहुत छोटा हो चला था जो कभी बहुत

बड़ा प्रतीत होता था खप्पर वाली छत थी जो काफी पुरानी हो चली थी।

बरसात के मौसम में बारिस के टिप –टिप टपकने का आनंद आप घर के अन्दर भी ले सकते हो।

 

कमरे के एक कोने में एक संदूक रखा हुआ था जिसमे बहुत सारे सपने बंद थे।

और बाहर एक ऊँघता हुआ ताला लगा हुआ था,

जिसे कभी जगाया नहीं गया था।

संदूक नीरा का था (बूढी औरत) जिसे उसने अपने मायके से लेकर लाई थी |

बाहर बहुओ के नए-नए बनाये कमरे थे।

और नीरा के कमरे के सामने ही रसोई घर जिसे वह देख कर अनुमान लगाती की आज खाना कितने समय

मिल जायेगा |

 

कुछ दिनों से नीरा को तेज बुखार था अब पानी के अलवा नीरा के गले से कहाँ कुछ उतरता था।

लेकिन फिर भी उसे खाने का इंतजार  रहता।

क्योकि अपने पति को खाते देखती तो उसे ख़ुशी मिलती…

 

दादी-पोती का प्यार

 

नीरा आज सुबह से दीवारों से कह रही थी की कितनी मेहनत से गृहस्थी जोड़ी है।

मेरे जाते ही देखना इसे देखने वाला कोई न होगा….

बहुओ को अपने श्रंगार से फुर्सत कहाँ है |

और कभी खुद को तसल्ली देने के कहती सब बहुत रोयेंगे मेरे जाने से ….

यह सब नीरा का पति सुनता लेकिन उसे सब पता था, की नीरा या उसके जाने से घर का बोझ ख़त्म होने के अलवा कुछ न होगा |

 

कभी बहुयें नीरा की बाते सुन लेती तो हँसी- ठितोली करती और कहती, हमें तो आपके जाने का जल्दी है और कितना इंतजार …

 

आज नीरा की हँसी की आवाज गुज रही थी घर में सबको लग रह था बुढ़िया पगला गई है लेकिन नीरा  का पति समझ चूका था,  की  आज

नीरा सारे दुःख-दर्द से आजाद होने वाली है|

 

नीरा अंतिम शब्द में सिर्फ इतना कहा मेरे भाग सच में ऊँचे है, चार बेटे है मेरे, सभी अपनी जिंदगी में खुश है, और मै सुहागन ही

 परलोग जा रही हूँ |

सबको ऐसा किस्मत कहाँ मिलती है |

 

पति को दया आ रही थी, की नीरा ने अपने अंतिम समय में चार बेटे का होना ही सुख का कारण है …कहा था।

लेकिन अगर सुख कारण होता तो …

अंतिम समय में इतना सम्पति के होते हुए भी दाने –दाने के लिए मोहताज न होना पढ़त …

इसे ही भाग्य समझ रही बेचारी |

 

नीरा के जाते ही ठाकुरजी केले पड़ गए कमरे में केवल अब एक बिस्तर था और संदूक  भी अपने जगह से गायब , पंखा  भी उसी गति से

चलता था, हवा की झोखे अब भी कमरे के अन्दर आने को बेताब रहती थी |

 

लेकिन नीरा की आवाज ही नहीं थी, ठाकुरजी अब दिन भर बाहर ताकते रहते,

पोते-पोतियाँ बाहर खेल रहे होते बहूएँ बाते करने में मशगुल होती।

बेटों को अपने-अपने काम में जाने की जल्दी होती |

 

ठाकुरजी बहुओ की बाते सुनते तो सच में उसे नीरा भाग वाली लगती, जो जल्दी चली गई|

जिसके कारण आज उसे ऐशी जहरीली बातें तो  न सुननी पढ़ रही है |

 

आज शाम चारो बेटे जल्दी आ गए थे और बहुए भी वही पर बैठी हुई थी।

बड़े बेटे ने कहा पिताजी के जाने के बाद सब अपना चूल्हा अलग कर लेंगे।

अब तक साथ है सिर्फ पिताजी के कारण क्योकि उन्हें बंटवारा नहीं पसंद था|

 

तभी मझली बहु ने कहा इसी जिद के कारण हमें ऐसे रहना पढ़ रहा , बड़ी बहु ने गुस्से से कहा ऐसे  मतलब क्या ?

हमने जैसे कोई तकलीफ न सही हो,

मै तो बहु से सास भी बन गई लेकिन मैंने सबकी ख़ुशी का सोचा और तुम ऐसा कह रही हो।

 

मंझले बेटे ने कहा हमने भी भईया का कभी अनादर नहीं किया है भाभी, और न ही आपका सविता के बातो को

आप दिल से न ले |

ठाकुरजी सब सुन रहे थे उन्हें आज अपने फैसले का दुःख था,

जब दिल से अपने, अपने न हो तो साथ रहो या दूर क्या फर्क पढता है |

 

छोटे बेटे के तेज आवाज ने ठाकुरजी को अपने विचार से बाहर निकाला।

वह बहुत गुस्से में कह रहा था, पूरण कुछ मै नहीं जानता अब सबका बराबर हिस्सा होगा |

 

बड़े भी ने कहा अछ्छा …हम लोगो ने तुम्हे अपने बच्चे की तरह तुम्हारा लालन-पालन किया है, उसका यही शिला है की तुम ऐसे बात करो |

बहुत देर तक बात होती रही कभी विवाद भी होता सब अपने मन का जहर आज निकाल रहे थे लेकिन  विवाद ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले

रही थी और आज फिर चूल्हा नहीं जला और ठाकुरजी भूख से व्याकुल हुए जा रहे थे |

लेकिन कर भी क्या सकते थे , तभी लखन.. सबसे छोटा नाती दौड़ कर आया और मुठ्ठी भर चने को देते हुए बोला दादाजी आपके लिए |

 

ठाकुरजी बहुत खुश होते हुए बोले बेटा कम से कम तुमको मेरा चिंता है, और चने खाने लगे ,चने भूख के कारण बहुत ही स्वादिष्ट लग रहे थे |

दुसरे दिन बहु जब कमरे में आई तो ठाकुरजी बोले…बड़ी बहु सभी को आज 1\2  घंटे के लिए मेरे पास आने को कहना।

बहु ने हाँ कह कर वहा से चली गई |

आज शाम सब इकठ्ठा हुए सब अपने पिता के कमरे में पहली बार इकठा हुए थे।

ठाकुरजी ने कहा अंकुर के दाने जब अलग हो जाते है तो वो जल्दी ख़राब हो जाते है |

 

ठीक इसी तरह परिवार भी है, मै किसी को सूखने नहीं देना चाहता था |

मेरा परिवार बहुत बड़ा था लेकिन मेरे पिता बचपन में ही चल बसे

जब 14 वर्ष का हुआ तो माँ चल बसी भाई-भोजी के साथ मै रहने लगा |

खाने को उस वक्त भी तरसता था और अब भी तुम्हारे होते हुए भी यही हाल है।

मेरा जैसे ही 16 बरस का हुआ शादी हो गई नीरा पत्नी बनकर आ गई और महिना होते होते  हमें अलग कर दिया गया |

 

एक कच्चा कमर मिला था जिसमे एक चारपाई था एक घड़ा कुछ बर्तन और तुम्हारी माँ का संदूक।

यही सम्पति था, हमारा और पेट पालने के लिए कुछ जमींन का हिस्सा मिला था |

 

तुम्हारी माँ और मुझे कहा खेती की समझ थी और न ही गृहथी की,

तुम्हारी माँ कुछ गहने भी लाई थी अपने साथ जिसे

वो शुरु में तो पहने रहती थी ।

लेकिन जब खेतो में कम करना पड़ता तो निकल कर संदूक में रख दिया करती |

 

कई दिन हमारे घर में चूल्हा ही नहीं जलता था लेकिन मेहनत करते रहे तो, वो दिन भी आ गया की हम लोग भी चैन की रोटी खा सके।

एक कमरे की जगह तीन –तीन कमरा बना लिया |

आँगन के चारो ओर अनार, बीही और बेर के पेड़ लगा दिए जो बहुत ही फल देता था।

घर में दूध और घी की नदियाँ बह रही थी अब घर में किसी चीज की कमी न थी।

 

लेकिन तब भी हम भाइयो के मन में इतना जहर न था जितना तुम सब के मन में है मुझे अपने फैसले पर दुःख है |

अब मन में दीवार बन ही गया है तो मेरे मरने का इंतजार मत करो …..

 

 

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