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हरी साड़ी

हरी साड़ी

 बड़ा होकर साहब बनूँगा और आपको काम करना नहीं पड़ेगा

राधा ख़ुशी से निहाल हो जाती और अपने बेटे को ऐसे देखती जैसे विनय अभी साहब बन गया हो। 

हरी साड़ी

राधा 25 -26  साल की एक घरो में काम करने वाली औरत, उसका 8 साल का बेटा विनय, पढ़ाई  में तेज था, स्कूल जाता और जब वह स्कूल से घर आता।

उसके माता- पिता अपने काम पर गए होते जिसके कारण उसे थोड़े बहुत घर के काम भी आता था।

राधा को सजना-सवरना बहुत पसंद था और हमेशा उसके होठो पे हंसी रहती थी।

उसका पति रिक्शा चलाता था इस  तरह दोनों की गृहस्थी की गाड़ी चल रही थी।

आवश्यकताएं भी कम थी और खुशिया ज्यादा थी। 

एक पसन्दीदा रूपा मैडम थी, राधा की।

वह राधा को हमेशा  दिवाली में नई और कुछ पुरानी  साड़ीया देती।

राधा को दिवाली का इंतजार तो रहता ही था, अपनी व अपने पति  के कमाई से वो केवल घर ही चला पाती थी।

घरो से जहाँ वो काम करती थी उसे कुछ खास लगाव नहीं था।

क्योकि रूपा ही थी जो उसे कभी नौकरानी होने का अहसास नहीं दिलाती थी। 

बहुत प्यार से बात करती थी, विनय भी राधा के साथ छुट्टी के दिन चला जाता।

कभी -कभी उसे टीवी देखने मिल जाता था, वो कभी बच्चो के खिलौने के साथ खेलने का मौका मिल जाता था।

विनय अपनी माँ से हमेशा कहता, मै भी बड़ा होकर साहब बनूँगा।

आपको काम करना नहीं  पड़ेगा, राधा ख़ुशी से निहाल हो जाती।

और अपने बेटे  को ऐसे देखती जैसे विनय अभी साहब बन गया हो। 

राधा के लम्बे इंतजार के बाद दिवाली आ ही गयी।

दिवाली के दिन भी सबसे पहले राधा अपनी चहेती रूपा मैडम से मिलने जाती थी।

इस बार भी गयी जैसे पहुंची मैडम तैयार हो रही थी, थोड़ा देर राधा को इंतजार करना पड़ा।

थोड़ी देर बाद रूपा  मैडम कमरे से निकलते हुए बोली इस बार मुझे  तैयारी करने में थोड़ा देर हो गया और साथ ही पूछा तुमने तैयारी कर ली।

राधा हस्ते हुए बोली मैडम हमको ज्यादा कहाँ तैयारी करना पड़ता है।

बस पूजा कर लेते है।

2 -4  दिए जला लेते है, कोई रिश्तेदार नहीं आता और न हम जाते है।

फिर मैडम कुछ कपडे, मिठाइयां और पटाखे राधा को देने पास आयी।

राधा की नजर अभी मैडम पर पड़ी तुरंत राधा ने कहाँ मैडम यह हरा रंग का साड़ी आप पर बहुत खिल रहा है।

कितनी  सुन्दर लाग रही हो आप, और मैडम ने बस मुस्कुरा  दिया थोड़ी देर बाद राधा ने पूछा मैडम साड़ी कितने की है …

रूपा मैडम हस्ते हुए बोली ज्यादा महंगी नहीं है , बस 2500 /- की है।

इतने में विनय आश्चर्य से, माँ को देख कर बोला इतने में तो घर का महीने भर का राशन आ जाता।

पैसे भी बच जाते…फिर राधा ने गुस्से से विनय को देखा और चुप रहने का इशारा किया। 

दोनों  वहां से निकल गए और रास्ते भर राधा सोच रही थी मैडम की यह साड़ी कब पुरानी होगी।

घर पहुंचते ही राधा के पति ने राधा का चेहरा देखते ही भाप लिया की कुछ तो बात है।

उसने पूछा क्या हुआ?

राधा ने कहा क्या  ?

फिर कुछ देर बाद बोली मुझे भी हरे रंग की मैडम की जैसा साड़ी चाहिए …. 

इस बार बेटे ने तुरंत उत्तर दिया…

माँ, मै साहब बन जाऊंगा तो उससे भी अच्छी साड़ी लाऊंगा, रूपा फिर से खुश हो गई। 

अब फिर से दूसरी दिवाली भी आ गई।

लेकिन मैडम की साड़ी इस दिवाली पुरानी नहीं हुई।

दिवाली आते गए, राधा का इंतजार बस इंतजार रह गया।

वह साड़ी तो पुरानी  नहीं पर राधा पुरानी, मतलब इंतजार में बूढी हो गयी।

और बेटा भी बड़ा साहब बन गया।

झोपडी की जगह अब रूपा का मकान पक्का बन गया, सारे ऐसो आराम थे,वहां पर।

बहु- बेटे, नाती -पोते, राधा और राधा का पति सारा परिवार मिलकर धूमधाम से दिवाली मनाते थे।

बस इन सब में उसे वह हरी साड़ी बहुत याद आती… विनय भूल चूका था

हरी साड़ी, या माँ का उम्र हो चूका सोच लिया था।

पर रूपा में उस हरी साड़ी की कसक अभी भी थी। 

मन से राधा अभी भी जवान थी।

हर दिवाली  की तरह इस दिवाली में भी राधा को हरी साड़ी की चाहत थी… 

 

           

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