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कमाने वाला

 

कमाने वाला

 

उन्होंने वह पेन अपने सहकर्मी की ओर बढ़ाते हुए कहा, सही कह रहे है,आप

 

आप  इसे रख लो अभी 62 बरष होने में आपको समय है और इतना कहकर मुस्कुराने लगे। 

 

 

 

श्री प्रकाश शर्मा जी पेशा से सरकारी अध्यापक थे, और साथ ही  कार्यमुक्त होने

वाले थे।

यह आखरी सप्ताह था उनके कार्यक्षेत्र  में…

और अब तो जो भी प्रकाश जी से मिलता एक ही बात कहता – अब तो आपके पास

 

समय ही समय होंगे, या रिटयरमेंट के बाद का  क्या प्लान है|

यह सब सुन कर सोच में पढ़ जाते, क्या नौकरी ही मेरी जिंदगी थी या मेरा अस्तित्व,

रिटायरमेंट के बाद क्या???फ   

 

मैं शिक्षक नहीं रहूँगा।

यह सब सोच कर प्रकाश जी का मन उदास हो जाता था।

सोचने लगते, अपने आगे आने वाले जिंदगी के बारे में। 

प्रकाश जी को दुनिया घुमने का बहुत मन था, जो पूरा नहीं हुआ।

 

कभी परिवार की जिम्मेदारी, तो कभी पैसो की कमी….

जीवन के उतार -चढाव देखे थे, प्रकाश जी ने… इन 62 बरष में।

लेकिन मन में सुकून था, बेटी को अच्छे घर विदा किया…

और बेटे को पढ़ाया, बस बेटे की नौकरी लगना बाकि है, और छोटी बेटी का विवाह

बाकि था।

 

फिर उसकी भी शादी करके अपने कर्तव्य पुरे कर तीर्थ कर लेने का सोच रखा था।

साथ अपने माता-पिता को घुमाने का मन था, और खुद का छोटा सा मकान बनाने

का सपना भी।

इन सब विचारो में खोये ही थे, की सहकर्मी ने आवाज दी, और कहा…काहा खोये है

शर्मा जी, घर नहीं चलना क्या ?

 

और कल शिक्षक दिवस भी है, साथ ही आपका विदाई समारोह भी।

शर्मा जी, हाँ में सर हिलाते हुए ,अपने कुर्सी से उठे और अपने स्कुटर से घर की

ओर निकल पढ़े। 

आज घर जैसे ही पहुंचे अंदर से पत्नी ने आवाज दी आ गए आप सिर्फ दो दिन और

फिर आप भी घर बैठ जायेंगे।

 

बेटे को समझाओ जल्दी काम पकड़ ले, शर्मा जी अपनी पत्नी को बीच  में ही टोकते

हुए बोला, तुम अब शुरू मत हो जाओ।

 

जाओ चाय बना कर लाओ, शर्माजी की पत्नी झल्लाते हुए किचन में चली गई।

शर्मा जी अपने घर के छोटे से गार्डन में कुर्सी लगा कर और साथ में अख़बार लेकर

चाय का इंतजार करने लगे। 

 

आज रात शर्मा जी को अच्छी नींद नहीं आई, बहुत से सवालो को ढूंढने की कोशिश

करने लगे थे।

साथ ही शिक्षक बनने के बाद का पहला शिक्षक दिवस भी याद करने लगे।

कितना खुश थे, उस दिन बच्चो का निस्वार्थ प्रेम और सम्मान पाकर और आज

आखरी शिक्षक दिवस होगा। 

 

उतना की प्यार और सम्मान मिलेगा, पर मन आज उदास था। 

स्कूल में बच्चो ने बहुत सजावट की थी।

हर बार की तरह तोहफों और नाश्ता का इंतजाम भी किया था।

लेकिन इस बार थोड़ा अलग था, वो था शर्मा जी का साथ में विदाई पार्टी जिसके

लिए शिक्षक भी व्यवस्था किये थे।

 

एक बड़े से डिब्बे में गिफ्ट पैक था, साथ ही स्टेज पर शर्मा जी का फोटो और भोजन

की भी व्यवस्था किया गया था। 

 

शर्मा जी को आज भाषण भी देना था, वैसे तो हर शिक्षक दिवस में दिया करते थे।

लेकिन इस बार अलग था, पुरे जीवन की कहानी जो बतानी थी,अपने अनुभव,

परेशानी ख़ुशी कर्तव्यों के बारे में। 

 

शर्मा जी के भाषण देने का समय भी आ गया।

वो जैसे स्टेज पर पहुंचे सभी ने जमकर ताली बजाई,

शर्मा जी ने अपना भाषण शुरू किया सब कुछ बया करना तो चाहते थे, पर आज

कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे।

 

जो शब्दो को जोड़ने में माहिर था….

आज उनके शब्द ही नहीं जुड़ पा रहे थे, आँखे भी नम हो गई थी। 

अन्य सहकर्मी जो अभी युवा थे, उन्हें यह सब उम्र का खेल महसुस हो रहा था।

शर्मा जी का प्यार और दर्द उन तक पहुंच ही नहीं पा रहा था।

बच्चे तो भाषण का ख़त्म होने के इंतजार में थे, ताकि घर जल्दी पहुंचे। 

समारोह ख़त्म होने के बाद शर्मा जी एक बच्चे के दिए पेन को देख रहे थे।

 

तभी एक सहकर्मी बोला, बहुत महंगा लग रहा है।

किस विद्यार्थी ने आपको दिया है, वैसे ये पेन अब आपके किस काम आएगी।

यह सुनकर शर्माजी को लगा क्यों पेन जब नौकरीपेशा रहो तभी काम आएगी…

फिर भी उन्होंने वह पेन अपने सहकर्मी की ओर बढ़ाते हुए कहा…सही कह रहे है आप।

 

आप इसे रख लो, अभी 62 बरष होने में आपको समय है।

और इतना कहकर मुस्कुराने लगे। अब शर्मा जी रिटायर भी हो गए।

और आज दूसरा दिन था, अपने कार्यक्षेत्र से मुक्त हुए और आज सुबह से ही बेचैनी

महसुस कर रहे थे।

 

पत्नी को एक कप चाय का कह कर अपने पसंदीदा जगह, छोटे से गार्डन में बैठ

गए और साथ में अखबार भी ले गए।

जैसे ही पत्नी चाय ले कर आई शर्मा जी ने कहा मुझे सीने में दर्द महसुस हो रहा है।

 

इस बात पर पत्नी ने गुस्से से कहा, आप को दो दिन ही हुए है।

काम से मुक्त हुए और खाली दिमाग शैतान का घर हो गया।

आप ऐसा करो घूम आओ कह कर भीतर चली गई।

लगभग एक घंटे बाद शर्मा जी की बेटी जो अभी पीहर आई थी।

सो कर उठी और कमरे में पिता को न पा कर गार्डन में देखने गई।

 

तो पिता जी कुर्शी में सट कर सो रहे थे। 

बेटी ने पिता को जगाने के लिए जैसे छुआ, शर्मा जी नीचे  गिर पढ़े, बेटी की चीख

निकल गई।

जिसे सुन कर शर्मा जी की पत्नी और बेटे बाहर आ गए।

जब सबको पता चला की शर्मा जी स्वर्ग सिधार गए। शर्मा जी की पत्नी का रो-रो

कर बुरा हाल हो रहा था, वह अपने आप को दोषी मान रही थी।

 

और बार-बार एक ही बात कह रही थी, मैंने इनकी बात क्यों नहीं सुनी।

बेटा और बेटी माँ को सम्हालने के साथ-साथ खुद को यकीन दिलाने की कोशिश

कर रहे थे, की उनके पिताजी इस दुनिया में नहीं रहे।

साथ ही सारे रिश्तेदार को फ़ोन भी कर रहे थे,  पडोसी घर में आवाज को सुनकर

पहुंच रहे थे।

 

सबको आश्चर्य भी हो रहा था, यह सब कैसे हो गया। 

लगभग सभी रिश्तेदार, सहकर्मी अब शर्मा जी के घर पहुंच गए थे।

अब तरह-तरह की बाते भी शुरू हो गई थी, रिश्तेदार हिम्मत देते और कहते होनी

को कौन टाल सकता है।

 

तो कोई कहता बेटा की शादी किये बिना ही चल दिए और मकान भी तो किराये का

है।

 

बेटा भी नहीं कमाता और भी तरह-तरह की बाते कहते, लेकिन शर्मा जी की पत्नी

स्वीकार ही नहीं पा रही थी, की वह सुहागन  नहीं रहा।

 

उसको लग रहा था शर्मा जी उठ जायेगे। 

बेटा शांत बैठा था पिता का साया नहीं रहा, और साथ ही सबसे छोटा सदस्य अब

बड़ा हो गया था।

 

सब आते और कंधे पर हाथ रखकर कहते तुम हिम्मत रखो।

घर तो अब तुम्हे ही सम्हालना है और तुम्हारे पिता तो अब रहे नहीं

तो अपने दादा-दादी का भी तुम्हे ही ख्याल रखना है। 

शर्मा जी के सहकर्मी ने आते ही कहा…

 

आज दूसरा दिन था रिटयरमेंट का, अगर यह घटना 2-3 दिन पहले होती तो बेटा

को नौकरी मिल जाती।

 

और कमाने वाला कम से कम एक सदस्य तो होता।

इतना बड़ा परिवार, उपर से एक बिनबिहाई बहन भी है।

इतनी सी उम्र में इतना सारा जिम्मेदारी, पुरी तनख्वाह भी पूरी नहीं पढ़ती इस

महगाई में आधी में भला कैसे

चलेगा भाभीजी  ….. 

 

यह सब कुछ शर्मा जी की बेटी सुन रही थी। 

और अपनी माँ को अंदर कमरे में लेकर जाते हुए बस एक ही शब्द अपने माँ से

बोल पाई…. 

 

हमारे पिता केवल हमारे लिए  सिर्फ कमाने वाले ही नहीं थे माँ  … 

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