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कविता ( part -2)

कविता

अब मै  कही नहीं जाउंगी।

मैंने अपना खुद का घर बना लिया है। जहाँ से मुझे कोई नहीं निकल सकता …   

कविता

क्या मैंने गलत किया ये सवाल मन में लिए अपने मायके पहुंची।

घर पहुंचते ही माता-पिता को देख कर, अपने आप को अपराधी की तरह समझ रही थी।

फिर आगे बड़ी तो माँ ने तुरंत कहा … ये तुमने क्या कर दिया, दामाद जी का फोन आया था।

बुढ़ापे में ये ही दिन देखना बाकि था, बस समाज वाले क्या कहेंगे…

बेटी पति पर हाथ उठा के मायके आ बैठी है। 

कही मुँह दिखने के लायक नहीं छोड़ा, कविता के पिता ने माँ को शांत कराया और कहा पहले बेटी को सुस्ता लेने दो बाद में सब बात-चीत करके हल निकाल लेंगे।

और कविता कल तुम सुबह फोन करके दामाद जी से माफ़ी मांग लेना। 

कविता ने हा में अपना सर हिलाया और बिना कुछ बोले वही खड़ी रही।

वह यह समझ चुकी थी, की आगे और कठिनाई आने वाली है और शायद वह अकेले ही है उन कठिनाईयों का  सामना करने के लिए…

सुबह हो गई  कविता  ने माता-पिता के कहने पर रोहन को फोन किया पर रोहन का कोई जवाब नहीं आया।

कविता समझ गई  पुरुष  को उसके झूठे अहम पर ज्यादा विश्वास होता है।

इतना जानते ही कविता की माँ, कविता पर भड़क गयी और बोली तुम्हारी सब गलतियों का ही परिणाम है।

गलती तुम करो और भुगतना हमको पढ़ रहा है।

वैसे भी कविता अब थोड़ा कठोर हो गयी थी या यह कह सकते है की समय के साथ बन गयी थी।

कोई कुछ बोले तो वह कुछ  उत्तर ही नहीं देती थी।

आस-पास रिश्तेदार सब कविता को ही दोषी ठहराते,कहते की तुम्हारी वजह से ही तुम्हारी गृहस्थी उजड़ी है।

और तुम सिर्फ एक बोझ हो अपने माँ-बाप पर … 

समय बीतता गया रोहन का और ना ही ससुराल का फोन आया।

कविता का 9 वा महीना शुरू हो गया और एक दिन तेज दर्द शुरू हुआ और कविता हॉस्पिटल गई।

वहां उसने एक लड़की को जन्म दिया।

अब वह सोचने लगी की, अब तो रोहन और ससुराल वालो का फोन जरुर आएगा….

जरूर मिलने आएंगे, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, ना खबर लेने कोई आया और न ही कोई  मिलने आया।

कविता ने  दृढ निश्चय ले लिया था, की अब वह किसी पर बोझ नहीं बनेगी ।

अपना और अपनी  बेटी का खर्च स्वयं उठएगी।

बेटी अभी सिर्फ तीन माह की हुई थी, की कविता ने अपना सिलाई-कढाई का काम चालू कर दिया था।

और साथ में ब्यूटी पार्लर भी चला रही थी।

दोनों काम करने लगी अब वह पूरी तरह से अपने पैरो पर खडी  हो गई थी।

अब उसकी बेटी भी 3  साल की हो गयी, वह स्कूल जाने लगी।

कविता का अब अपने पति से उम्मीद लगभग खत्म ही हो गया था। 

लगभग  ५ साल बीत गए लेकिन कविता अभी भी मांग में सिंदूर, मंगल सूत्र एक सुहागन का हर श्रृंगार करती थी बेटी ५ साल की होने वाली थी।

फिर एक दिन कविता को रोहन का फोन आया कविता ने ख़ुशी से झट से फ़ोन उठाया तो देवर ने कहा भाभी मै बोल रहा हु…

कविता सिर्फ हाँ बोली।

देवर ने कहा भैया का देहांत हो गया आज सुबह, कविता ने कांपते हुए पूछा कैसे …

तो उधर से उत्तर मिला भैया का 10 -15 दिन से तबियत ख़राब हो गया था … और आप कब आओगे।

कविता ने कहा अभी।

आज पहली  बार कविता के आँखों से प्रेम और इतंजार के आँसू रुपी झरने बाह पड़े थे।

वह जोर-जोर से रोने लगी।

रोहन जैसा भी था कविता का पति था और एक सीधी -साधी लड़की ने उसे ही अपना परमेश्वर माना था।

अत्याचार सहा फिर भी पति के साथ थी।

मायके आने के बाद पहली बार कविता इस तरह से जोर-जोर से रोने लगी।

माता-पिता और पड़ोस वालो को समझने में देर न लगी क्या हुआ होगा।

सभी इकठ्ठा हो गए और कहने लगे की  जो पति तुम्हारा कभी सुध नहीं लिया।

उसके लिए इतना दुखी होने की क्या जरूरत और क्यों इतना आंसू बहा रही हो ।

तुम्हारे ससुराल वालो को भी  तुम्हारी याद अभी आई।

इन सब बातो से अनजान कविता रोये जा रही थी फिर किसी तरह अपने आप को सम्हाला और ससुराल जाने को तैयार हो गई।

माँ ने इस बार कहाँ अब किसके लिए जा रही है वहां…

कविता ने कोई जवाब नहीं दिया।

जैसे ही ससुराल पहुंची सास ने कहाँ कविता जल्दी चलो तुम्हे सफ़ेद साड़ी पहननी है और सारे श्रृंगार उतारने होंगे।

कविता के आँख में फिर से आंसू भर गए, और हाँ में सर हिलाया।

मानो अब कविता पे मुसीबतो का पहाड़ टूट पड़ा हो अब वह सोच रही थी।

एक छोटी सी जो उम्मीद बची थी वो भी अब टूट गई। 

समय बीतता चला गया कविता को विधवा हुए अब 3 साल हो गए थे अब अपनी जीवन में वह आगे बढ़ गयी थी।

अब  सिर्फ अपनी बेटी के लिए जीना सीख गयी थी, दिन भर अपना काम करती और अपने बेटी के लिए  सपने सजाती और जीती।

आज ससुर जी का फोन आया और कहा की हम अपनी बेटी से मिलना चाहते है।

कविता ने हाँ कर दी क्योकि वो चाहती थी, की उसके बेटी  को हर तरह की  खुशिया  मिले दादा-दादी,चाचा-चाची सभी का।

पिता की कमी तो हमेशा रहेगी।

कुछ देर बाद सास-ससुर मिलने आ गए और बोले,चलो बेटी हमारे  साथ चलो।  

कविता ने बड़े प्यार से पूछा देवर जी ने आप दोनों को छोड़ दिया न।

और ननद की भी शादी हो गयी, तो एकाकी जीवन जी रहे है।

तो अब मुझे  चलने के लिए कह रहे है …

कविता के ससुर के पास इसका कोई उत्तर नहीं था।

कविता ने कहा जब इंतजार था,तब उस घर से,किसी ने मेरी सुध नहीं ली, बहु माँ बनने वाली थी।

तब भी किसी ने ध्यान तक नहीं दिया।

अब मै कही नहीं जाउंगी मैंने अपना खुद का घर बना लिया है, जहाँ से मुझे कोई नहीं निकल सकता  … 
                   

                                                             

 


                             

 

 

 

 

 

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