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माँ और संघर्ष …

माँ और संघर्ष

वह बच्चे कभी स्कूल भी देख नहीं पाएंगे।

और उनका भविष्य भी पता नहीं क्या होगा।

लेकिन वह औरत एक मदर इंडिया से कम नहीं थी, आखिर एक भारतीय माँ जो थी

जिनके आँचल में ममता का पूरा सागर होता है। 

माँ और संघर्ष

आज सुबह से ही रुची  को बहुत काम था।

9AM  की ट्रैन थी तो सामान को अच्छे से समेटना, जमाना और सही जगह में सही सामान को रखना, ताकि जब जरूरत हो तो तुरंत मिल सके।

रुची  का आठ महीने का एक बेटा है, उसके लिए भी काफी कुछ रखना, सम्हालना पड़ता है।

रेल्वे स्टेशन दूर होने के कारण थोड़ा समय से पहले निकलना  पड़ता है ।

जैसे-तैसे सारा पैकिंग हो गया और स्टेशन के लिए निकल पढ़े।

राहुल, रुचि और आयु  ख़ुशी-ख़ुशी स्टेशन जा रहे थे, आयु को कार में जाना बहुत पसंद था। 

स्टेशन पहुंचते ही पता चला ट्रैन बहुत लेट है।

अब इतना छोटा बच्चा लेकर इंतजार करना , ऊपर से इतनी गर्मी बहुत मुश्किल लग रहा था।

राहुल सामान लेकर आगे चलता है।

रुची  बच्चे के साथ पीछे चल रही थी।

एक जगह देखकर  तीनो बैठ गए, थोड़ी देर बाद रुची की नजर एक औरत पर पड़ती है।

वो भीख मांग रही थी, गन्दी सी साड़ी, बिखरे हुए बाल, पतली सी औरत, गोद  में 1 -2  महीने का बच्चा, जो की बहुत कमजोर लग रहा था।

साथ में एक उसका भाई भी था, जो 5 – 6 साल का रहा होगा।

और 2 बहन भी थी छोटी 1 -2  तथा बड़ी 3 -4  के बीच  रही होगी। 

रुची  का ध्यान उन लोगो पर जाने लगा।

वो औरत कुछ देर बाद, वही पर, जहा रुची बैठी थी आ गई व एक चादर बिछा के बैठ गयी।

अपने बच्चो के साथ-साथ उसका पति भी आया, जो की काफी बीमार लग रहा था।

बाजु में गमछा बिछा कर सो गया, और वो औरत अपने बच्चो के साथ मस्त थी। 

अपने बच्चो के साथ खेल रही थी, हँस रही थी।

इतनी तकलीफ, गरीबी होने के बाद भी खुश थी और ऊपर से गर्मी जहाँ बाकि लोग बैठ नहीं पा रहे थे।

वो औरत उसके बच्चे जैसे उनको गर्मी का कोई अहसास ही ना हो|

कभी छोटे बेटे को गोद में लेकर प्यार करती तो कभी बड़े  बेटे  को दुलार करती।

माँ का ममता बरस रहा था पर उसका ध्यान उनकी बेटियों पर कम था, यह सब देखकर रूचि को लग रहा था।

वह बेटा – बेटी में भेद कैसे कर सकती है।  

उस औरत को देख कर तरस भी आ रहा था।

की कैसे इन बच्चो को सम्हालती  होगी, न छत, ना खाना, ना  कपडे, और साथ में 4  बच्चे।

थोड़ी देर में एक गाड़ी आ के रुकी बड़ा बेटा दौड़ के गया, मुआयना करने, की कितनी भीख मिल सकती  है।

वापस दौड़कर अपने माँ के पास आया।

औरअपनी माँ को कुछ बताया… वो औरत अपने छोटे बेटे  को  गोद में लेकर चली गयी।

आगे-आगे बड़ा बेटा जा राहा था।

थोड़ी देर बाद तीनो वापस आये यह सिलसिला चलता रहा जब भी कोई ट्रैन आ के रूकती तो तीनो यहीं करते।

उस औरत को अपने बड़े बेटे पर बहुत गर्व था, क्योकि वह इतना फुर्ती से जो काम कर रहा था।

उस लड़के में समय और परिस्थिति के कारण बचपना बिलकुल भी नहीं था , थोड़ा हठी, निडर और थोड़ा गुस्सा वाला।

रोज-रोज ऐसे ही जिंदगी जीना पड़ता था, शायद इसलिए भी ऐसा बनना या बनके रहना जरुरी भी था।

बीच-बीच में उसका पति अपने परिवार को देखता और फिर आँख बंद करके सो जाता।   

रुची यह सब देख रही थी।

और देखने का मन भी नहीं कर रहा था क्योकि बच्चो को देखकर बहुत पीड़ा हो रहा थी ।

भूख के कारण बच्चे बहुत कमजोर दिख रहे थे।

बचपना,  शरारत, नादानियाँ ये सब जैसे उनके डिक्शनरी में ही नहीं था।

जो उन बच्चो को भी पता नहीं था। 

हर औरत में ममता तो अपार होती ही है, इन सब के बावजूद उन बच्चो को माँ प्यार करना नहीं भूल रही थी।

कभी झूला झूलती तो कभी सभी पर प्यार ,ममता लुटाती। उन बच्चो के लिए छोटा बच्चा एक खिलौना से कम न था।

छोटे बच्चे को गोद में उठाकर बाकि बच्चे अपना चेहरा उसके पास ले जाते, छोटा बच्चा भूख के कारण चुसने  या चाटने की कोशिश करता।

जिससे बाकि बच्चे खुश हो जाते और जोर-जोर से हसते। 

छोटी लड़की को अब ज्यादा भूख सताने लगी उसकी फ्राक भी पीछे से पूरी तरह से फटी हुई थी, बहुत मासूम चेहरा था।

बच्ची का अपने माँ से खाने की चीजे मांगने लगी।

इतने में उसका बड़ा बेटा कही से सूखा चावल लेकर आ गया, उसकी माँ तुरंत अपने गंदे हाथो से जगह साफ करती है।

और अपने झोले से एक थाली निकाल कर पन्नी से चावल को पलट देती है।

फिर सभी बच्चो को खाने के लिए बुलाती है।

पति खाने से मना कर देता है।

छोटी लड़की भूख के कारण जल्दी-जल्दी खाने लगती है, यह देखकर माँ को गुस्सा आता है।

उसे मरने लगती है, क्योकि खाना तो सबको बराबर खाना था।

और जिससे लड़की रोने लगती है, खाने को छोड़कर दूर बैठ जाती है।

अब रुची, आयु और राहुल का इंतजार ख़त्म हो गया।

ट्रैन आ गई जैसे ट्रैन आई सब चढ़ने लगे, लेकिन रुची का ध्यान उन्ही लोगो पर था।

थोड़ी देर ट्रैन वही रुकी रही उसका बड़ा बेटा पुरे ट्रैन में घूमने लगा और आके अपने माँ को कुछ बोला।

फिर पुरा परिवार सहित वो और  ट्रैन में चढ़ गई ।

रुची  पुरे रास्ते यही सोच रही थी की एक माँ चाहे कोई भी परिस्थिति में हो अपने बच्चे और परिवार के बारे में ही सोचती है।

और पूरा चौकन्ना रहती है, की किस तरीके से सबका पेट भरे और किस तरीके से उनकी  सुरक्षा करे।

यह गरीबी बहुत बुरा होती ही है, पर आज रूचि उसको सामने और दिल से महसूस कर रही थी। 

वह बच्चे कभी स्कूल भी देख  नहीं पाएंगे ,और उनका भविष्य भी पता नहीं क्या होगा।

लेकिन वह औरत एक मदर इंडिया से कम नहीं थी॥

आखिर एक भारतीय माँ जो थी, जिनके आँचल में ममता का पूरा सागर होता है।

 पुरे रास्ते बस यही कश्मकश चलता रहा………. 

 
 
 
 
 

 

 

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