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मांगलिक

मांगलिक

आज उसे दिल से मांगलिक होने का पछतावा हो रहा था।

और जोर से रोने लगी, आँखे बंद हो गयी और सिर्फ एक ही बात बोल पाई…हा मांगलिक हु।

वो अब विनय के साथ उसकी दुनिया में थी। 

मांगलिक

रूपा, जैसा नाम वैसा ही रूप, दिखने में बहुत सुन्दर, उतनी ही दिल से साफ और सच्ची।

तीन भाई, बहन में छोटी और लाडली थी, रूपा पढाई – लिखाई, घर के काम-काज सब में आगे थी।

बड़ो का हमेसा आदर करती मीठी बातो से सबका दिल जीत लेती थी

वह जहा जाती सब का मन मोह लेती।    

                                 

लेकिन कहते है ना, चाँद में भी दाग होता है, बस एक दाग उसमें भी था….वो मांगलिक थी।

सुनने समझने में जरूर यह बचकानी बात लगे पर अभी भी भारतीय समाज का एक हिस्सा है।

गाव में अभी भी यह समाज में एक गहरा प्रभाव डालता है।

खैर रूपा भी इस स्थिति से और समाज भी इस रोग से पीड़ित थी, रूपा का रिश्ता तय नहीं हो रहा था।

रूपा में कोई ऐब नहीं था …लेकिन रूपा के कुन्डली मे तो था। 


जब रूपा 10 -12 साल की थी तब तक उसे कुंडली का मतलब भी समझ नहीं आता था।

उस समय से अपने माता -पीता से सुनते आई थी वह मांगलिक है।

कोई परिवार वाले या रिश्तेदार आते, तो सभी उसके मांगलिक होने का अफ़सोस करते थे।

अब रूपा को मांगलिक होने का मतलब समझ. … नहीं अच्छे से समझ आ गया था। 


पोस्ट ग्रेजुएट होने के बाद रूपा एक गैर सरकारी संस्था में नौकरी  करने लगी 23 साल की थी तब से उसके लिए घर वाले लड़का ढूंढ रहे थे।

रिश्तेदार पडोसी सभी ताना मारते थे

शायद इसलिए भी नौकरी में दिन भर व्यस्त रहना चाहती थी।

लड़के वाले रूपा को देखने आते और मांगलिक कुंडली देख के शादी के लिए मना कर देते रूपा सोचंती, आज के समय मे दुनिया कहा से कहा पहुच गयी है।

और लोग कुंडली में ही उलझे हुए है।

हर बार माँ उसे सांत्वना देती, समझती की तुम्हारा भाग्य दुसरो से अच्छा है। 

देर से ही सही सब ठीक हो जायेगा तुम दुखी कभी मत होना। 


रूपा 28 वर्ष की हो गयी अचानक एक दिन ऑफिस से निकलते वक्त एक लड़के को देखा बहुत आकर्षक था।

दोनों की आँखे टकराई रूपा कुछ शर्मा सी गयी फिर दोनों अपने रास्ते चले गए। अगला दिन रविवार, मतलब छुट्टी का दिन  था।

सुबह पापा की फोन की घंटी बजी ,और पापा ने बात करने के बाद, पापा ने कहा कुछ लोग आ रहे है

तुम लोग तैयारी कर लो।

रूपा का मन उदास हो गया फिर से वाही ड्रामा और रिजेक्शन।

कोई चारा भी नहीं रूपा के पास जैसे-तैसे रूपा तैयार हो गयी       

कुछ देर बाद लड़के वाले आये सामने वाही लड़का था

जिसको देख रूपा शर्मा गयी थी विनय,विनय ने भी रूपा को एक नजर में पसंद कर लिया।

रूपा को भी यह लड़का पसंद आया था।

विनय अपने व्यव्हार से संस्कारी, विनम्र लग रहा था।

लेकिन रूपा के मन में एक डर भी था, कि कही कुंडली देखने के बाद विनय और उसके परिवार वाले मना कर दे।

पर इस बार ऐसा नहीं हुआ इस बार कुंडली से ज्यादा रूपा जीत गयी। 


विनय और रूपा की अब बाते फोन व्हाट्सप्प, फेसबुक पर होने लगी दोनों को बाते करना समय बिताना अच्छा लगता था।

दोनों एक दुसरे से भली-भांति परिचित हो गये और भविष्य के सपने बुनने लगे।

अब रूपा को अपने मांगलिक होने पर कोई अफ़सोस नहीं था बल्कि खुश थी की देर से सही अच्छा मिला।

विनय रूपा की पसंद न पसंद का बहुत ख्याल रखता था देखते देखते सगाई भी हो गयी।

शादी का इंतजार होने लगा…इस बीच का सफ़र भी सुहाना होता है, मन जैसे सातवे आसमान पर था।

वो दिन भी आ ही गया दोनों स्टेज पर थे और वही कपडे पहने थे, जो मिल के ख़रीददारी की किए थे

सब कुछ वैसा ही जैसा रूपा और विनय ने सोचा था।

दुल्हन के लिबास में रूपा का रूप निखर गया था और लाल जोड़े में वह बेहद खुबसूरत लग रही थी।

विनय भी बहुत आकर्षक लग रहा था। 


दुल्हन बनकर रूपा अब विनय के घर में आ  गयी यह सब कुछ रूपा को सपना लग रहा था।

शादी के 3-4 दिन बाद विनय को अपने नौकरी में इंदौर जाना पड़ा।

ताकि वह वहां सभी अरेंजमेंट करके रूपा को वहां ला सके।

रूपा की सास भी बहुत अच्छी थी, विनय के न होने पर भी रूपा का बहुत ख्याल रखती थी।

उसे किसी चीज की कमी महसुस नहीं होने दी।

उधर विनय भी अपने सपनों के घर को संजोने में लगा हुआ था।

नया टीवी सोफे, कूलर, पर्दा सभी रूपा के पसंद का खरीद रहा था।

उसने रूपा को फ़ोन पर कहा था मै 7 दिन बाद  आने वाला हु सामान पैक कर लेना,  रूपा अपने सपनो के घर में खो गयी।

और विनय का बेसब्री से इंतजार  करने लगी। 

सात दिन बड़ी मुश्किल से बीते, विनय बस से आ रहा था दोनों लगातार फोन में बाते कर रहे थे

विनय के उस सफ़र के बारे में रूपा को बता रहा था

बहुत खुश थे, दोनों आखिर  7 दिन का इंतजार जो खत्म हो रहा था।                        

फिर अचानक जोर की आवाज रूपा को सुनाई दी व लोगो की चीखने -चिल्लाने की आवाज आ रही थी।

रूपा बहुत घबरा गयी और चिल्लाने लगी विनयविनय विनय।

लेकिन उस तरफ से कोई आवाज नहीं आ रहा था, रूपा बेहोश हो गयी आंख खुला तो घर का माहोल अलग था।

उसे समझते देर न लगी की क्या हुआ है। 


थोड़ी देर में विनय का शव रूपा के सामने था जिसे देख कर वह बेसुध हो गयी थी।

अपने कमरे में जाकर अपने आप को आईने में निहारने लगी।

चूड़ी बिंदी सिंदूर सिर्फ कुछ दिनों का ही साथ था रूपा को माँ की याद आने लगी सोच रही थी कोई होता जिससे गले लग के जी भर के रोती,..

अपने  सरे दर्द आंसू के जरिये निकालने के लिए बेताब हो रही थी।

तभी बहार से औरतो की बाते सुनाई देने लगी क्यों ब्याह किया मांगलिक लड़की से अपने लड़के का, इस अभागन ने पति को खा लिया।

यह सुनते ही अपने मांगलिक होने का गम फिर से रूपा को याद आ गया। 

रूपा को याद आ रहा था विनय के साथ बिताये हुए पल, कितनी सुन्दर-सुंदर साडी, रंग-बिरंगी चुडीया दोनो ने मिलकर ख़रीदे थे।

उन साडी की तह भी ना खुल पाई थी और अब खुलने वाली भी नहीं थी। 

विधवा होने का जो रिवाज होता है उसके लिये रूपा को बुलाया गया एक-एक करके वो सारे सिंगार अलग हो गये जिसे देख कर विनय बहुत तारीफ करता था।

अब रूपा सफ़ेद साडी में खड़ी थी यह पल एक स्त्री के लिए सबसे बड़ा पीढ़ा देने वाला होता है

कोई भी स्त्री विधवा कभी नहीं होना चाहती। 

रूपा पत्थर की मूर्ति सी बन गयी थी वह सारे लोगो को आते-जाते देखते रहती।

फिर जैसे-तैसे सफ़ेद सारी को सम्हालते हुए अपने सास के पास जाती है।

सास जोर से गुस्से में कहती है तुम्हारे कारण ही मेरी गोद सुनी हो गयी अब इस घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं, तुम जा सकती हो।

अपने घर तुम्हारा सामान वैसे भी पैक पड़ा हुआ है। 


आज उसे  दिल से मांगलिक होने का पछतावा हो रहा था।

और जोर से रोने लगी, आँखे बंद हो गयी और  सिर्फ एक ही बात बोल पाई…

हा मांगलिक हु, और वो अब विनय के  साथ उसकी दुनिया में थी। 

                                                                                                                           

2 thoughts on “मांगलिक

  1. Bahut sahi topic pe likhe ho mam.
    Waise niyati ka khel bhi kuchh aisa hota h ki kuch rudhhiwadi parampara ko sahi thehra deti h… Ab dekho na aapki kahani me bhi aisa hi ho gya… Bechari rupa ko us galti ki saza mil gyi jo usne kiya hi nahi… Khair ab jo hona tha wo to gya lekin ek kahani aisa bhi likhna jisme vinay ka accedent isiliye na ho ki rupa manglik h ar rupa hi vinay k maut ka karan thi…ish baar duniya ko jhutha sabit krna.

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