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नींबु

नींबुमासुम प्यार की कहानी

 

बुजुर्ग महिला के चेहरे में बड़ी सी मुस्कुराहट आ गई, यह सुनते ही, और कहा…क्या करोगी

नींबु का ????

 

                                                                          नींबु

 

निशु कस्बे में रहने वाली एक 8-9 साल की लड़की थी।

पिताजी का छोटा सा व्यसाय था और माँ हाउस वाइफ थी।

उसके के दो बड़े भाई भी थे, निशु के छोटे से घर में खुशिया बड़ी थी।

और उस घर के छोटे-छोटे बच्चो के साथ सपने भी बड़े थे। 

 

पिता की आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी, अपने ही  कस्बे  के सरकारी स्कूल में तीनो बच्चो का दाखिला करा दिया था।

बच्चे जहा पैदल ही जाया करते थे, सभी के पास बैग व जूते भी नहीं थे, थैला और चप्पल, लेकिन स्कूल 

यूनिफार्म इन सारी कमी को ढक देती थी।

जब स्कूल पाहुचते तो कभी कम या ज्यदा का बच्चो को आभाष ही नहीं होता था ।

 

स्कुल  से लगा हुआ ही एक बाजार था, जहा पर खिलोने, कपडे, सब्जी, और खाने की सामग्री जैसे जलेबी,

समोसे, मिठाईया और साथ ही शृंगार सामग्री भी मिलती थी।

पिता जी, सप्ताह में एक दिन सभी बच्चो के हाथ में पांच रूपये रख कर कहते, इससे तुमको जो पसंद वो खा लेना।

 

और बच्चे ख़ुशी से पैसा लेते और बहुत जोश में स्कुल जातेजैसे उस पांच रूपये में पूरी दुनिया खरीद लेंगे।

उस दिन स्कुल के घंटी बजने का इंतजार भी बहुत होता था। 

 

लेकिन इन सब में निशु सोच रही होती आज माँ के लिए क्या लु, जो उनको बहुत पसंद आये और दोनों भाइयो को जलेबियाँ बहुत पसंद थी।

तो वो हर बार वही खाते ,निशु को समोसे को देखकर लालच तो बहुत आता, लेकिन माँ की ख़ुशी के आगे

लालच कोई मायने कहा रखती थी।

निशु के माँ को हमेशा पता भी होता की निशु कुछ खायेगी नहीं, बस  पैसे मेरे लिए खर्च कर देगी

हर बार माँ उसके लाई ,चीजों को नापसंद करने का नाटक भी करती, ताकि बेटी भी कुछ खा पाए। 

 

आज फिर से निशु ने माँ के लिए एक बिंदी का पैकेट ख़रीदा, माँ को लाल रंग की बिंदी बहुत पसंद थी।

जैसे ही निशु घर पहुंची माँ को आँगन में बैठे देख, माँ से लिपट कर बोली , देखो मै क्या लाई हु

और माँ झूठ-मुठ गुस्सा करते हुए, मैंने तुम्हे मना किया था ना, तुम नहीं  सुधरोगी और निशु थोड़ा उदास हो जाती

 

कभी भी माँ को कोई चीज पसंन्द ही नहीं आती

अपनी माँ की ओर देखते हुए कहती॥

देखना एक दिन जरूर, मै आपकी मनपसन्द चीज लाऊँगी । 

 

और निशु दूसरे सप्ताह का इंतजार करने लगी।

इस बार निशु को बहुत ज्यादा इंतजार करना पड़ा, दुसरे सप्ताह का।

वह दिन आ  गया, फिर तीनो भाई -बहन को पांच -पांच रूपये मिले। 

 

जैसे ही स्कुल की छुटटी हुई, निशु बाजार पहुंच गई।

जैसे ही बाजार पहुंची उसकी नजर एक बूढ़ी महिला पर पड़ी, एक टोकनी में बड़े -बड़े नींबु बेच रही थी

उसके पुरे शरीर पर सफ़ेद दाग थे।

और उसका नींबु कोई खरीद भी नहीं  रहा था।

उसके पास जाकर पांच रूपये को आगे बढ़ते हुए बोली, निशु… इसमें कितने नींबु आएंगे। 

 

बुजुर्ग महिला के चेहरे में बड़ी सी मुस्कुराहट आ गई यह सुनते ही और कहा. . .क्या करोगी नींबु का ????

 

निशु बोली जब भी मुझे पैसा मिलता है, मै अपनी माँ के लिए कुछ न कुछ जरूर ले जाती हु।

पर वो कभी खुश ही नहीं होती, शायद नींबु से ही खुश हो जाये।

बुजुर्ग महिला कहा जरूर खुश होगी मै तुम्हे रसीले नींबु दुंगी। 

 

माँ, बेटी का ही इंतजार कर रही थीं

उसे पता होता था, बेटी कुछ लाने वाली है। 

 

हर बार की तरह माँ से लिपट कर बोली निशु  देखो मैंने क्या लाया आपके लिए।

माँ ने जब निशु का  थैला देखा तो बड़े आश्चर्य से बोली  पांच रूपये में  इतने सारे नींबु

 

निशु ने तुरंत जवाब दिया पूरा दस नींबु है माँ…

माँ ने बेटी का माता चुमते हुए कहा-मै बहुत खुश हूँ…

मेरी इतनी सी गुड़िया मुझसे इतना प्यार करती है।   

                                                       

निशु बोली मैं बोली थी, न आपको एक दिन मेरे लाये सामान पर ख़ुशी जरूर होगी… 

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