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पिताजी

पिताजी

 

जिस बात से कभी अभिनव को पिताजी पर गुस्सा आता था।

 

वो आज उसे अच्छा लगने लगा, अब वह पिता के अर्थो को समझने लगा है।

 

 

                                                        पिताजी

 

भिनव आज एक सफल इंसान है, आज उस जगह पर पहुँच चुका है।

जहाँ वह सोचा भी नहीं था।

एक सफल व्यक्ति हर नजर से पारिवारिक व सामाजिक होता है।

 

कोई इंसान ऐसे ही सफल नहीं हो जाता, उसके पीछे कोई न कोई जरूर होता है।

अभिनव के सफर में उनके साथ, उसके पीछे थे।

 

रामगोपाल चतुर्वेदी जी… जो की उसके पिताजी थे।

रामगोपाल जी एक कलर्क थे, मामूली सी तनख्वाह, पर भरा-पूरा परिवार का

बोझ… साथ ही थोड़े सख्त मिजाज भी।

बहुत कम बोलने वाले और हर काम को समय पर पूरा करने में विश्वास रखने वाले थे।

 

बच्चो के लिए भी सख्त नियम थे, सुबह 5 बजे उठना, व्यायाम करना।

और उसके बाद स्कुल जाना, स्कुल के आते ही सिर्फ एक घंटे के लिए खेलने जाना।

फिर पढाई और रात का भोजन और 9 बजे तक सो जाना।

 

और इस दिनचर्या में बदलाव की कोई गुंजाइस ही नहीं होती।

हा किसी रविवार को रिश्तेदार के यहाँ या बाहर कही घूमने ले जाते।

अपने पिता के इस व्यवहार पर अभिनव को बहुत गुस्सा आता। 

 


अभिनव अब 12 वी की परीक्षा पास कर ली और इंजीनियरिंग करने 

बाहर जाना पड़ा।

अब अभिनव  कॉलेज के हॉस्टल में रहने लगा।

 

लेकिन वो बचपन की आदते जो पिताजी ने बनाई थी, वो अभिनव

यहाँ भी नहीं छोड़ पा रहा था।

कोशिश तो की, लेकिन नहीं कर पाया दोस्तों के बीच  मजाक का पात्र

भी बनता।

तो कभी तारीफ भी होती थी, कभी बुरा भी तो कभी अच्छा भी  लगता। 

 


अभिनव की पढाई भी पूरी हो गई।

और अपने ही  शहर के आईटी कंपनी में जॉब ज्वाइन कर लिया।

लेकिन अभिनव कभी जॉब करना नहीं  चाहता था।

उसे शुरू से अपना खुद का बिज़नेस करना था।

 

अभिनव रोज बेमन से ऑफिस जाता था, लेकिन अपने पिता से यह

बात बोलने से डरता था।

कारण भी था, अभिनव जिस परिवार से था वहा सब नौकरी पेशा थे। 
 

                                                                   

एक शाम ऑफिस से आकर अभिनव बैठा ही था की, पिता ने आवाज

दी बेटा जरा कमरे में आना और आते हुए तुम्हरी माँ को चाय के लिए

बोल देना।

 

अभिनव कमरे मे जैसे ही गया पिताजी अपने आदत के अनुसार किताब पढ़ रहे थे।

 

अभिनव को देखते हुए बोले, बैठो बेटा तुमसे  थोड़ा सा  काम है।

आगे बोलने  लगते है, क्या तुम अपने काम से खुश नहीं हो, जब तक काम में ख़ुशी न हो जिंदगी के और दूसरे  काम भी अच्छे से नहीं होते।

 

अभिनव थोड़ा आश्चर्य से बोला .. . पर आपको कैसे पता चला।

मैंने तो किसी से कुछ कहा भी नहीं है ।


इस बात पर पिता ने मुस्कुराते हुए बोले, जिंदगी के 60 बरष देखे है

मैंने, साथ ही तुम्हारा पिता भी हु।

 

तुम्हारी हर बात तुमसे पहले मै जान लेता हू।

तुम जो करना चाहते हो या तुमको जो भी करना पसंद हो  तुम

करो, पर पूरे मन लगा के करना।

 

ईमानदारी और पूरे जोश के साथ, जो की असफलताओ मे भी टूटे ना। 

अभिनव थोड़ी देर चुप रह कर बोला, आप अब रिटायर हो चुके है।

घर का खर्च और छोटी की शादी सब कुछ बाकी  है।

 

पिता जी ने कहाँ थोड़े सेविंग है तुम चिंता मत करो।

 

अभिनव कमरे से निकलते हुए अपने पिता के प्यार को,  नजदीक से

महसूस कर रहा था।

 

और उनके  पिताजी  सख्त मिजाज से कुछ अलग प्रतीत हो रहे थे, ये

अभिनव के लिए थोड़ा अलग सा था।

अब अभिनव ने नया बिज़नेस शुरू कर दिया।

 

लेकिन शुरुआत में ही घाटा हो गया और वह फिर परेशान रहने लगा

इस बार खुद ही सारी बात पिताती को बताई।

 


पिताजी ने लम्बी सास भरते हुए कहा … . बेटा जिंदगी में चुनोतिया तो आती ही है।

घबरा कर भाग जावोगे तो कैसे आगे पढोगे और दूसरी बात यहाँ पर

तुम खुद अपने लिए रास्ता बना रहे हो।

दुसरो के रास्तो में चलना आसान है।

 

अभिनव अब फिर से अपने काम पर लग गया।

और एक साल बाद उसका काम अच्छे से चलने लगा और देखते-

देखते चार साल बीत गये।   

         

अब अभिनव का बिज़नेस भी बहुत बड़ा हो गया था।

अपने ही ऑफिस की ही एक लड़की को दिल दे बैठा, लेकिन अब यह

बात अपने घर पर बता पाना मुश्किल था।

 

माँ को गोरी सुन्दर बहु चाहिए और साथ ही सजाति भी, नेहा तो अलग कास्ट की है और सुन्दर भी नहीं।

मतलब समाज के पैमाने मे ठीक नहीं बैठती, सावली और थोड़ी नाटी ।

 

अब घर वाले अभिनव के लिए लड़की देखते और हर बार अभिनव टाल देता।

शाम को पिता जी का फोन आया,  जैसे ही अभिनव ने  फ़ोन उठया

पिताजी ने कहा तुम्हारा रिस्ता मैंने तय कर दिया है।

 

इतना सुनते ही अभिनव भागते हुए घर पंहुचा।

पहुंचते ही माँ से कहा किससे रिश्ता तय कर दिया, पिता जी ने पीछे से

हसते हुए बोला तुम बताओगे नहीं तो क्या हमें पता नहीं चलेगा।

 

अब बता भी  दो।

अभिनव थोड़ा डरते हुए अपनी माँ को देखते हुए बोला …

नेहा नाम है, उसका मेरे ही ऑफिस में काम करती है। 

 


माँ ने कहा. . .इसमें घबराने वाली क्या बात है।

अभिनव ने कहा, माँ वो बहुत सावली  है।

 

माँ ने कहा इसमें क्या इतना सोचना लड़की तो है न, और उसके माता -पिता, जोर-जोर से हसने लगे।

थोड़ी देर चुप रह कर अभिनव बोला-  पिताजी वो सजाति भी नही है।

 

इस पर माँ ने तुरंत कहा – अभिनव यह नहीं चलेगा।

गुस्से में अपने कमरे में चली गई। 

पिता जी, अभिनव के पास आये और कंधे में हाथ रखते हुए कहा तुम

फ़िक्र मत करो।

 

मै मना लूंगा तुम्हरी माँ को।

अभिनव को थोड़ा सा उम्मीद दिखा पिता के बातो से।

सच में पिता ने अपनी पत्नी को मना लिया और थोड़े दिनो बाद सहनाई भी बज  गई। 

 


आज अभिनव पिता बन गया और अपने बेटे को जब गोद में लिया तो अपने पिता का प्यार और सख्त मिजाज होना।

 

जिस बात से कभी अभिनव को पिताजी पर गुस्सा आता था. . .

वो आज उसे अच्छा लगने लगा, अब वह पिता के अर्थो को समझने

लगा है ।

 

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