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वो पेड़ का अदृश्य बन्दर

वो पेड़ का अदृश्य बन्दर

 

वो पेड़ का अदृश्य बन्दर कहानी  ट्रेन में सफ़र कर रहे बुजुर्ग व्यक्ति की है जो जीवन में नए अनुभव का संचार करती है ।

 

राजीव अब जब भी ट्रेन से सफर करता है, उस दिन को और उस बुजुर्ग आदमी को

जरूर याद करता है।

 

लेकिन अब सफर में राजीव का बेटा जो चार साल का है, वो साथ होता है।

और जब भी बच्चा परेशान करता राहुल जरूर उसे पेड़ पर बन्दर दिखाता ।

 

 

राजीव कालेज में पढ़ने वाला उन्नीस साल का लड़का था, जो हॉस्टल में रहता था।

जब भी कॉलेज में छुट्टियां लगती वो तुरंत अपने घर चला जाता।

शहर और कॉलेज की दुरी 200 किमी रही होगी, जिसके कारण जाने में भी परेशानी नहीं होती।

और जाने के लिए बस और ट्रेन दोनों की सुविधा थी, तो सफर करना आसान भी होता था। 

 

पहली बार घर से बाहर रह रहा था, तो जीवन के इस बदलाव को आसानी से स्वीकार भी नहीं कर पा रहा था।

इस बार फिर कॉलेज की छुटिया लगी, और राजीव ट्रेन से अपने घर जा रहा था।

 

जिस ट्रेन  से राजीव अक्सर घर जाया करता था, वो ट्रेन आउटर में जा के रुक जाया करती थी।

कभी-कभी एक घंटे के लिए भी रुक जाया करती, उस दिन भी ऐसा ही हुआ।

 

दोपहर का समय था और ट्रेन आउटर में रुक गई…

ऊपर से गर्मी का दिन भी था ,सभी लोग पसीने में लगभग नहा चुके थे। 

जिस बोगी में राजीव सफर कर रहा था।

 

उस बोगी में एक बुजुर्ग और उसके साथ 4-5 साल का बच्चा भी सफर कर रहे थे।

ट्रेन को रुके भी काफी टाइम हो गया, तो बच्चा अपने दादा को बहुत परेशान करने लगा।

बहुत तेज आवाज में चिल्लाता तो कभी रोता, बोगी में बस उसी की आवाज गुंज रही थी।

 

वो बुजुर्ग बच्चे को हर तरह से मनाते -मनाते  लगभग थक चुके थे।

और बच्चा चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था। 

राजीव का घर जिस शहर में था, वो हरयाली से भरापूरा था।

या कह सकते है, प्रकृति की गोद में था राजीव का शहर पहाड़ ,नदी-नाले ,पेड़-पौधे इन सबके बीच में था शहर,जहा पर ट्रैन रुकी थी।

 

वहाँ  से पहाड़ दिखाई दे रहा था और पहाड़ के ऊपर एक मंदिर भी था।

जो विशाल शिव जी का मंदिर था।

पुरा पहाड़ पेड़-पौधे से हरियाली से ढका हुआ था, जैसे हरियाली की चादर ओड़ ली हो। 

अब भी बच्चा रोये जा रहा था, और बुजुर्ग आदमी उसे शांत करने में लगा हुआ था।

 

फिर बुजुर्ग आदमी ने बच्चे को पहाड़ के तरफ इशारे करते हुए कहा….

देखो बेटा उस मंदिर के बगल में जो पेड़ है, उसमे बन्दर बैठा हुआ है। 

इतना सुनते ही बच्चा बड़ी मासुमियत से पेड़ और बन्दर दोनों को देखने की कोशिश करने लगा।

और अब वो शांत हो गया था, और किसी भी तरह वो बन्दर को देखना चाह रहा था। 

 

साथ ही सभी का आकर्षण का केंद्र भी बन गए थे दादा-पोते।

सभी दोनों को ही देख रहे थे, थोड़ी देर बाद बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा मेरा चश्मा कही दिखाई नहीं दे रहा कहा चला गया।

ऐसा बोलते-बोलते इधर-उधर चश्मा  ढूढ़ने की कोशिश करने लगा। 

राजीव बुजुर्ग व्यक्ति को चश्मा ढूंढ़ता देख कर अपनी शीट से उठ कर आया।

चश्मा ढूढ़ने में मदद करने लगा, राजीव जैसे ही नीचे झुका सीट के नीचे उसे चश्मा मिला।

 

राजीव ने चश्मा उठाया और उस बुजुर्ग व्यक्ति को देते हुए कहा ये लीजिये दादा जी आपका चश्मा।

बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा-धन्यवाद बेटा, चश्मे के बिना मुझे दूर की चीजे ठीक  से दिखाई नहीं देती  . . .

इस बात पर राजीव मजाक करते हुए कहा, क्यों दादा जी आपको  इतने दूर का पेड़ और पेड़ का बन्दर तो दिखाई दे गया।

 

जो हममे से किसी को नहीं दिखा, ऐसा सुनते ही दादा जी चेहरे पर बड़ी सी मुस्कुराहट बिखर गई।

और साथ ही सभी लोग जोर-जोर से हसने लगे।

 

ट्रेन  भी अब चल पड़ी और सभी अपनी-अपनी मजिल पर भी पहुंच गये।

लेकिन इतनी गर्मी और लम्बा इंतजार पता ही नहीं चला दादा और पोते के वजह से  . . .

 

राजीव अब जब भी ट्रेन से सफर करता है उस दिन को, और उस बुजुर्ग आदमी को जरूर याद करता है।

लेकिन अब सफर में राजीव का बेटा जो चार साल का है, वो साथ होता है,

और जब भी बच्चा परेशान करता राहुल जरूर उसे पेड़ पर बन्दर दिखाता ।

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